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पगडंडी

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गौरी पनघट से नहीं, भरती नल से नीर।

छरहरी काया न रही, थुलथुल हुआ शरीर।।

थुलथुल हुआ शरीर, नित्य ही वैद्य बुलावे,

दूध परहेज छोड़,  पिज्जा ही  मंगवावे,

सुनलो कहे अशोक, नहि यह गाँव की छोरी,

आयी दुल्हन गाँव, बन के शहर की गौरी।।

             …

 

पगडंडी दिखती कहाँ, चौतरफा अब रोड।

समयचक्र के साथ ही, बदले कितने मोड़।।

बदले कितने मोड़, बनी डामर की सड़कें,

कृषि चोखा व्यापार,कृषक भी बचे न कड़के,

खड़ी गाँव के द्वार, देखो कृषक की मंडी, 

भूले अब तो लोग, गाँव की वह पगडंडी।।

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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Cassara के द्वारा
11/07/2016

É, o cara é sem dúvida o melhor diretor de RH da F1 de todos os tempos – e ainda por cima pilota!Ou alguém acha que &qtÃo;so³&qutu; guiar como ele guia teria tirado a Ferrari do marasmo em que estava quando ele topou ir para a equipe?

pramod chaubey के द्वारा
24/11/2013

आदरणीय अशोक जी,सादर प्रणाम   प्रकट होइए, महराज..कहां हैं. आपकी..व्यस्तता तो होगी… न जाने कब के रिस्ते थे.जो बने थे..आगे तो चले…आपका प्रमोद..

yamunapathak के द्वारा
30/04/2013

अशोक सर नमस्कार बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं दिखी. साभार

Lahar के द्वारा
23/03/2013

आपकी कविता ने गाँव की याद दिला दी ! जहाँ हमारा बचपन गुजरा ..

ajay kumar pandey के द्वारा
19/03/2013

आदरणीय रक्ताले जी नमन आपके ब्लॉग पर देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ जागरण जंक्शन के लेखक बंधुओं के आलेख पढ़े बिना समय ही नहीं बीतता कारण की यहाँ अच्छे लेखक हैं मुझे इन लेखकों से ही अच्छे ब्लॉग लिखना सिखने को मिला दरअसल मेरी बोर्ड की परीक्षाएं थी तो ब्लॉग पर नहीं आ सका अब बोर्ड परीक्षा से मुक्त हुआ तो ब्लोग्स पर आया हूँ आपकी रचना मुझे अच्छी लगी आपने सही कहा है की गाँव में अब पगडण्डी दिखने को नहीं मिलती सिर्फ सड़क ही दिखती है आपकी रचना बहुत अच्छी है आप मेरा ब्लॉग महाकुम्भ में स्नान और भ्रमण के अनुभव जरुर पढियेगा धन्यवाद

17/03/2013

सादर प्रणाम! भोगौलिक और भौतिक विकास की दौड़ में…………………..एक आरामदायक और सुबिधाजनक जीवन की तलाश में………………………सजीवता से निर्जीवता की तरफ बढ़ते हुए मानव समाज की साफ़ झलक प्रस्तुत करती पक्तियां…………….!

Sushma Gupta के द्वारा
11/03/2013

अशोक जी, गांव की पुरानी यादें ताज़ा करती हुई ,आपकी यह वेहतरीन रचना है .वधाई स्वीकारें …

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
06/03/2013

रक्तले जी, अत्यंत सुंदर…भावों को खोजती भावपूर्ण रचना….साभार…

bhagwanbabu के द्वारा
05/03/2013

सुन्दर रचना कोमल ह्रदय को छूती हुई रचना http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/03/05/%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A5%8D%E0%A4%AE/

Malik Parveen के द्वारा
04/03/2013

अशोक जी नमस्कार , बहुत बढ़िया रचना …. बधाई स्वीकारें ! पगडंडी दिखती कहाँ, चौतरफा अब रोड। समयचक्र के साथ ही, बदले कितने मोड़।। बदले कितने मोड़, बनी डामर की सड़कें, कृषि चोखा व्यापार,कृषक भी बचे न कड़के, खड़ी गाँव के द्वार, देखो कृषक की मंडी, भूले अब तो लोग, गाँव की वह पगडंडी।।

arunsoniuldan के द्वारा
01/03/2013

आदणीय…….. खड़ी गाँव के द्वार, देखो कृषक की मंडी, भूले अब तो लोग, गाँव की वह पगडंडी।। ……………….गागर में सागर प्रस्तुति के लिए धनयवाद………

roshni के द्वारा
01/03/2013

अशोक रक्ताले जी नमस्कार ati सुंदर rachna .. खड़ी गाँव के द्वार, देखो कृषक की मंडी, भूले अब तो लोग, गाँव की वह पगडंडी। बहुत खूब abhar

seemakanwal के द्वारा
01/03/2013

आदरणीय अशोक जी छोटी सी रचना गागर में सागर हो गयी . बहुत सुन्दर . सादर .

yogi sarswat के द्वारा
28/02/2013

गौरी पनघट से नहीं, भरती नल से नीर। छरहरी काया न रही, थुलथुल हुआ शरीर।। थुलथुल हुआ शरीर, नित्य ही वैद्य बुलावे, दूध परहेज छोड़, पिज्जा ही मंगवावे, सुनलो कहे अशोक, नहि यह गाँव की छोरी, आयी दुल्हन गाँव, बन के शहर की गौरी।। नीचे भी आपने जो रचना लिखी है वो भी बहुत सुन्दर है लेकिन अगर दोनो को कॉपी करता तो लगता की ये मेरी ही रचना बन गयी , हहहाआआअ लेकिन बहुत सुन्दर काव्य है आदरणीय श्री अशोक रक्ताले जी ! पिज़्ज़ा ने दूध दही की जगह ले ही ली है !

    akraktale के द्वारा
    28/02/2013

    आदरणीय योगी जी सादर आभार, कोई बात नहीं रचना आपकी हो या मेरी आनंद तो पढने वाले को ही आयेगा. फिरभी यह बात पूर्वज रचनाकारों को गंवारा नहीं रही होगी इसलिए उन्होंने हर छंद में अपना नाम देने की गुंजाइश रखी है ताकि कोई आपकी रचना चुरा न सके. स्नेह बनाए रखे.

    akraktale के द्वारा
    28/02/2013

    प्रतिक्रया के लिए सादर आभार आदरणीया शालिनी जी अवश्य ही समय मिलते मैं अवश्य आपके आलेख को पढूंगा.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
26/02/2013

नियमानुकूल समसामयिक कुण्डलिया के लिए आदरणीय भाई अशोक जी , आप को सादर बधाई !!

    akraktale के द्वारा
    27/02/2013

    आदरणीय आचार्य जी सादर, कुण्डलिया छंद को सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार.

utkarshsingh के द्वारा
26/02/2013

गौरी पनघट से नहीं, भरती नल से नीर। छरहरी काया न रही, थुलथुल हुआ शरीर।।                         -   गजब की सादगी पर सीधी और सटीक चोट | साधुवाद ! अधोलिखित लिंक पर आपकी अमूल्य टिप्पडी की अपेक्षा है , कृपा करे- http://utkarshsingh.jagranjunction.com/2013/02/23/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%94/

    akraktale के द्वारा
    27/02/2013

    आदरणीय उत्कर्ष सिंह जी आपका हार्दिक आभार वक्त मिलते है मैं अवश्य ही आपके आलेख पढूंगा. सादर.

Madan Mohan saxena के द्वारा
25/02/2013

बहुत सराहनीय प्रस्तुति.बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    आदरणीय मदन मोहन जी सादर, रचना सराहने के लिए आपका बहुत बहुत आभार.

nishamittal के द्वारा
25/02/2013

आदरनीय अशोक जी ग्राम्य जीवन पर शहरी जीवन का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है अच्छी पंक्तियाँ

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    आदरेया निशा जी सादर, अनुमोदन एवं रचना सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
25/02/2013

आदरणीय अशोक जी सादर अभिवादन दोनों ही स्थिति सही चित्रित बनती है बधाई बधाई.

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    आदरणीय प्रदीप जी सादर प्रणाम,अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार.बस आपका यही स्नेह बना रहे यही प्रेम की होली है.जवाहर जी को तो आप पहले ही होली का पूछकर रंगो में भिगो आये हैं. सादर.

shashi bhushan के द्वारा
25/02/2013

आदरणीय अशोक जी, सादर ! “गाँव कहाँ अब गाँव हैं, टूट गई चौपाल ! समय नहीं जो पूछ लें, एक दूजे का हाल ! एक दूजे का हाल न पटती घरवाली से ! इश्क लड़ाते छैला बन बाहरवाली से ! ठेका सरकारी खुला, बीस रुपैया पाव ! “नूरी” “जानेमन” मिले हर बस्ती हर गाँव !!”

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    हर बस्ती हर गाँव, मिले देशी अंगूरी, जानेमन या पाव, भले कह दो तुम नूरी. टूट गयी चौपाल, शशिजी सच ही कहा है, पहले जैसा गाँव, सर जी अब नहि रहा है/ आदरणीय शशिभूषण जी सादर,सुन्दर छंदात्मक प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार.

aman kumar के द्वारा
25/02/2013

छरहरी काया न रही, थुलथुल हुआ शरीर।। थुलथुल हुआ शरीर, नित्य ही वैद्य बुलावे,| बहुत अच्छे शहाब ये तो सहर का भी हाल है ! गौरी क्या हमारा आपका और सबका यही हाल है | ]\ पर मज़ा आया !

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    भाई अमन कुमार जी सादर, बिलकुल सही कहा है आपने यहाँ इसी बात को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है की गाँव में भी शहर की छवि दिखने लगी है. रचना को सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार.

jlsingh के द्वारा
25/02/2013

खड़ी गाँव के द्वार, देखो कृषक की मंडी! भैया पी लो चाय, कहीं हो जाय न ठंढी! बही बसंत बयार, भैया भूल न जाना ! माजा बोतल संग, रसना भी ले आना! मजा आगया भाई जी, और मेरे भी स्वर फूट पड़े…. समझिये होली की शुरुआत हो गयी है, आज माघी पूर्णिमा है! कल से फागुन आयो रे!

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    25/02/2013

    कब है होली हा हा हा

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    आदरणीय जवाहर जी भाई सादर, आनंद आगया आपको भी छन्दों के रंगो में डूबते देखकर. आपने भी सुन्दर रोला छंद गढ़ दिया है. वाह! स्नेह बनाए रखे. 

rajanidurgesh के द्वारा
24/02/2013

सरजी , सर्वदा की तरह उत्तम रचना

    akraktale के द्वारा
    25/02/2013

    डॉ. रजनी जी रचना सराहने के लिए सादर आभार.


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