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इकलौती सन्तान स्वेच्छा या मजबूरी – एक विचार.

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वर्ष २०११ कि जनगणना के अनुसार देश में जनसंख्या का आंकडा 1,210,193,422  था  जिसमे पुरुष 623,700,000 और नारी 586,500,000 संख्या थी. वर्ष २०१२ के अनुमानित आंकड़े जों क्रमशः जनसंख्या, पुरुष और नारी कि संख्या बता रहे है इस प्रकार हैं 1,220,200,000/628,800,000/ 591,400,000. इन आंकड़ों से हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि देश में जनसंख्या का बढ़ता दबाव कितने खतरनाक स्तर कि ओर जा रहा है. हर दिन आपकी रोटी से हिस्सा माँगने वाले बढते ही जा रहे हैं. हर दिन देश में काम माँगने वालों कि संख्या में इजाफा हो रहा है. जबकि आधुनिक मशीनों के कारण कई हाथों से रोजगार छीनता जा रहा है.समस्या कि विकरालता को देखते हुए. सरकार और समझदार दोनों इसको नियंत्रित करने के प्रयास के तौर पर परिवार सिमित रखने पर सहमत हो चले हैं. हाँ कुछ सम्प्रदाय अपने धर्म कि दुहाई देकर इसमें सहयोग करने में असमर्थता जाहिर करते हैं तो कुछ अज्ञानता के कारण असहयोगी नजर आते हैं.शायद यही कारण है कि सरकार को जनसंख्या नियंत्रण में आशातीत सफलता नहीं मिल रही है. जब हम जनसंख्या कि कुछ दशक आगे स्थिति का अनुमान लगाते हैं तो दिल बैठा जाता है.हम जनसंख्या वृद्धि पर मानव कि जगह मशीन बनकर विचार करें तो हम यही कहेंगे कि नहीं अब और नहीं.

                         किन्तु हम मानव हैं और एक सामाजिक संस्था का निर्माण करके रहते हैं.तब हम अपने आपको मशीन नहीं बना सकते. आज हम चाहे इस बात पर सहमत हुए हों कि देशहित में  या आर्थिक दबाव या फिर भौतिकतावाद कि चकाचौंध के कारण एक ही सन्तान को जन्म देंगे. किन्तु जब हम अपने सामाजिक परिवेश को देखते हैं तो यह हमें किसी समझौते से कम भी नहीं लगता.यूँ भी अभी हम पर हमारे पडोसी मुल्क चीन कि तरह सरकारी दबाव नहीं है और अभी हम स्वतंत्र है एक से अधिक सन्तान को दुनिया में लाने के लिए.एक से अधिक सन्तान में दो लडके, दो लडकियां या फिर जिसे हम और हामारा समाज श्रेष्ठ मानता है एक लड़का एक लडकी क्योंकि हम जिस समाज में पले बढे हैं वहाँ कई त्यौहार हमने ऐसे निर्धारित कर दिए हैं जिन त्योहारों पर इकलौती सन्तान अभिभावकों से प्रश्न पूछती नजर आती है शायद हमने इस सर्वश्रेष्ठ जोड़ी कि कल्पना कर ही यह त्यौहार बनाए हैं.जैसे भाईदूज, रक्षाबंधन आदि जिसे हमने अपने बचपन में खूब ही उत्साह के साथ मनाया किन्तु आज अपने ही बच्चे को हम एकाकी जीवन देकर इससे महरूम रखने पर मजबूर हैं.यह एक भावनात्मक पहलू ही सही किन्तु हम जीते ही भावनाओं के दायरे में हैं.बात यदि इतनी ही होती तो समझ में आता किन्तु इकलौती सन्तान कई बार घर में कई बातों को अभिभावकों से शेयर नहीं कर पाती तब उसे बहुत जरूरत होती है अपने भाई या बहन की. जब सभी परिवार संयुक्त रूप से साथ साथ रहते थे तो यह समस्या कुछ हद तक नियंत्रित रही होगी किन्तु आज नौकरी पेशा परिवार अपने घरों से बहुत दूर रहते हैं जहां उनके घर में परिवार के तीन सदस्यों के अतिरिक्त यदि कोई होता है तो उनके घर में काम करने वाले सदस्य कई बार जब बच्चों को कोई साथी नहीं मिलता तो वे इनके साथ काफी हिलमिल जाते हैं और इनसे वह संस्कार पाते हैं जो संस्कार उन सदस्यों के होते हैं और अक्सर इसके बहुत ही गंभीर परिणाम भी देखने को मिले हैं.जिसमे सर्वाधिक देखा जाने वाले नुक्सान के तौर पर मादक पदार्थों का सेवन है. यदि घर में कोई काम करने वाला  सदस्य नहीं भी है तो इकलौता बच्चा कई बार कुंठाग्रस्त हो जाता है. इसलिए माता पिता उसे मनमानी छूट देकर रखते हैं यह भी कई बार घातक हो जाता है. यह कहावत एक पूत यमदूत भी कुछ यूँ ही नहीं बनी होगी अवश्य उसके पीछे अनुभव रहा होगा.

                   आज जब सिर्फ एक सन्तान कि बात की जाती है तो आवश्यक नहीं है कि वह लड़का ही हो लडकी भी हो सकती है.जब सुरक्षा असुरक्षा के मापदंडों को देखा जाए तब लडकी होने कि दशा में चिंता में वृद्धि स्वाभाविक है. किन्तु मै जो महसूस करता हूँ वह इससे परे है. हम पूरी तरह घर में देख भाल करके पुत्री को सक्षम बना कर उसे हमारे रीती रिवाज के अनुसार उसे ब्याह देते है क्योंकि यही रीत है.उस लडकी का ससुराल के बाद बहुत ही प्रिय स्थान अपने माता पिता का घर होता है.अभिभावकों कि मृत्यु के पश्चात उनकी इकलौती सन्तान के लिए वह ठिकाना खत्म हो जाता है जहां वह अपने सुख दुःख कि बात निसंकोच कह सके यदि उसका कोई सहोदर होता है तो वह उसके पास जा कर किसी अपने के होने का सुखद एहसास को पाती है किन्तु जब एकलौती संतान हो तब उसके लिए सिर्फ अपना ससुराल ही सबकुछ हो जाता है यह एक बहुत गम्भीर कारण है क्योंकि यह उसके मन में कुंठा पैदा कर देता है जो कभी अहंकार के रूप में भी देखने को मिलता है.यह सिर्फ लडकियों के लिए ही नहीं है लडके या ये कहूँ कई पुरुषों को मैंने वृद्धावस्था में भी ऐसी समस्याओं के कारण दुखी देखा है.

                  इसलिए मेरा मानना है कि परिवार में एक से अधिक सन्तान होना हमारी सामाजिक जरूरत है किन्तु अपनी सन्तान को हम अपने सिमित आर्थिक साधनों में अच्छे से अच्छा बनाने कि चाहत रखते हैं आज कि परिस्थिति में एक बच्चे को भी काबिल बनाना बहुत खर्चीला साबित हो रहा है तब हमें उस बच्चे के भावनात्मक पहलू कि बजाय उसके आर्थिक पहलू का अधिक ध्यान रहता है इसीलिए देखने में आ रहा है कि परिवार सिर्फ एक बच्चे के जन्म तक ही सिमटते जा रहे हैं.



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