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पोखर बनाम सरकार

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सूख रहा जल का पोखर,खुद ताप बढ़ाकर,

कुमुद कमल सरिसर्पों का,संताप बढ़ाकर/

गरल कंठ से बह निकला,उन्माद दिखाकर,

शुष्क सरोवर में रहने, की राह दिखाकर//

 

विहग पशु ढोर चमगादड़,कर रहे जलपान,

सूख रहे पोखर सम ही,सुखे उनकी जान /

वृक्ष वृन्द खड़े किनारे,चूर मद अभिमान,

टूट पर्ण जब गिरे धरा,घटा अरु सब मान//

 

निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर,

कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/

कूपमंडूक  बैठ गये,  सब  आस लगाकर,

क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर//



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66 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Leaidan के द्वारा
11/07/2016

Salve prof.Volevo chiederle se gentilmente poteva mettere delle slide che aveva fatto vedere il prof Romano sulla distribuzione dove spiegava il modo di posizionare i prodotti negli scaffali etce;8230#Asp&tto sue notizieLa sua tortura

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
07/11/2012

प्रकृतियुक्त यह रचना निश्चित तौर पर देश के हालातों को बयां कर रही जिसमें आम आदमी निरीह मृग की तरह ही नजर आ रहा है। अत्यंत सुंदर रचना,…रक्तलेजी…

    akraktale के द्वारा
    09/11/2012

    आदरणीय सिंह साहब सादर, इस काव्य रचना को मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
01/11/2012

आदरणीय अशोक जी, सादर अभिवादन, बेस्ट ब्लाग्गर बन्ने पर बहुत-२ बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    akraktale के द्वारा
    01/11/2012

    आदरणीय सिद्धाकी जी                  सादर, धन्यवाद. 

Sushma Gupta के द्वारा
31/10/2012

आदरणीय रक्ताले जी, आपकी समसामयिक रचना देश की वर्तमान कुव्यवस्था को उजागर करने में पूर्णतया समर्थ जान पड़ती है. सचमुच आज देश की हालत कुछ ताकतवर हाथों में आकर सूखे पोखर जैसी ही हो गयी है. जहाँ जनता गरीबी, भुखमरी बेरोज़गारी महंगाई, जैसी अनेको महामारियों से जूझ रही है, अब इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकना ही सर्वोत्तम उपाए है. इसलिए अपने सही ही कहा है क़ि “क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर” |

    akraktale के द्वारा
    01/11/2012

    आदरेया सुषमा जी                   सादर नमस्कार, सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है. मेरी इस रचना के उद्देश्य पर सहमति दर्शाने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया.

Madan Mohan saxena के द्वारा
29/10/2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति

    akraktale के द्वारा
    29/10/2012

    आदरणीय मदन जी                          सादर, रचना को सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार.

yogi sarswat के द्वारा
29/10/2012

निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर// दिल से निकले हुए शब्द , कितना याद दिलाएं , किस किस को याद दिलाएं ! बहुत सुन्दर रचना आदरणीय रक्ताले जी !

    akraktale के द्वारा
    29/10/2012

    आदरणीय योगी जी                        सादर, बिलकुल सही किस किस को याद दिलाएं. सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

vinitashukla के द्वारा
29/10/2012

वर्तमान परिवेश का सार्थक एवं सफल चित्रण. बधाई अशोक जी.

    akraktale के द्वारा
    29/10/2012

    सादर आभार, आदरेया विनीता जी.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
28/10/2012

कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर// प्रिय अशोक भाई जहां तक बेचारे तालाब की बात है तो वह तो खुद नहीं करता है हाँ उसके कारण सब को परेशानी हो रही है लेकिन यहाँ तो मानव रूप में जन्म ले के जो गधे बन पृथ्वी का भार बने हैं उनके बारे में ये बिलकुल जायज ही है काश कभी उनकी आँखें खोली जाएँ जनता कभी एक जुट हो तो आनंद और आये भ्रमर ५

    akraktale के द्वारा
    29/10/2012

    काश कभी उनकी आँखें खोली जाएँ जनता कभी एक जुट हो तो आनंद और आये. आदरणीय भ्रमर साहब बस इसी बात कि तो चाहत है किन्तु जनता तो खंड खंड बंटी हुई है. इतनी जन विरोधी और भ्रष्ट सरकार के विरुद्ध भी लाम बंद नहीं होना निराश ही करता है. आपकी विषयानुकुल प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
28/10/2012

सुन्दर कविता,आदरणीय अशोक जी. विहग पशु ढोर चमगादड़,कर रहे जलपान, सूख रहे पोखर सम ही,सुखे उनकी जान वृक्ष वृन्द खड़े किनारे,चूर मद अभिमान, टूट पर्ण जब गिरे धरा,घटा अरु सब मान सुन्दर पंक्तियाँ.

    akraktale के द्वारा
    29/10/2012

    आदरणीय राजीव जी                     सादर, रचना पसंद करने के लिए धन्यवाद.

jyotsna singh के द्वारा
27/10/2012

आदरणीय अशोक जी, सचमुच देश की दशा सूखे पोखर जैसी हीहो गई है,कूड़े करकट और गंदगी से भर कर सड़ांध मारता पोखर जिसमे अब पशुओं को भी पानी नसीब नहीं है.लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है,क्या हम लोग खुद नहीं हम अपने छोटे छोटे स्वार्थों के लिए ,समाज,और देश को तक पर रख देते हैं ,कोई सोच रहा है देश के बारे में??,नेताओं के अपने स्वार्थ हैं और जनता के अपने.देश के बारे में कौन सोच रहा है.जिसके पास खाने को है वो अपने में मगन है और जिसके पास नहीं है वो खाने कमाने की फिक्र में लगा है.

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    आदरेया ज्योत्सना जी                     सादर, वक्त निकाल कर रचना पर प्रतिक्रया देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

27/10/2012

अशोक भाई नमस्कार, उच्च कोटि की बहुत सुंदर और साहित्यिक रचना। खास ये पंक्तियाँ बिलकुल समसामयिक…… विहग पशु ढोर चमगादड़,कर रहे जलपान, सूख रहे पोखर सम ही,सुखे उनकी जान / वृक्ष वृन्द खड़े किनारे,चूर मद अभिमान, टूट पर्ण जब गिरे धरा,घटा अरु सब मान//… आप बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं। दाद कुबूल करें !!

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    आदरणीय डॉ. सुर्याबाली जी                                सादर, आपसे इस रचना पर सराहना पाकर अतिशय प्रसन्नता हुई. आभार.

meenakshi के द्वारा
27/10/2012

Akraktale जी, नमस्कार ! ‘पोखर बनाम सरकार ‘ कम शब्दों में वर्तमान कालीन सच उकेर दिया . बहुत- शुभकामनाएँ , आपको. मीनाक्षी श्रीवास्तव

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    मीनाक्षी जी             सादर नमस्कार, आपको कविता का कथ्य पक्ष अच्छा लगा आपका कोटिशः धन्यवाद.

seemakanwal के द्वारा
27/10/2012

आदरणीय अशोक जी कविता बहुत सुन्दर और देश की दशा ऐसी ही बदतर .

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    आदरेया सीमा जी                    सादर, सराहना और सहमति के लिए आपका हार्दिक आभार.

shashibhushan1959 के द्वारा
27/10/2012

आदरणीय अशोक जी, सादर ! “”निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर//”" बहुत अवसाद भरी रचना ! निराशा भरी ! स्थिति भयावह है भी ! लेकिन इतनी निराशा क्यों ? निराशा तो अँधेरे के गर्त में ले जायेगी! सब दिन होत न एक समान ! बदलाव भी आयेगा ! कुँए के मंडूकों में भी हलचल मची है ! मंडूक बदलाव को आतुर हैं ! कुछ मंडूकों ने बगावती तेवर भी अपनाए हैं ! जरुरत है उन्हें बल देने की ! सादर !

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    आदरणीय शशिभूषण जी                          सादर नमस्कार, भाई साहब मन के भावों पर कैसे बस करूँ जब देश में आजादी के बाद से पहली बार 18600000000000 इतनी बड़ी बड़ी रकम के घोटाले सामने आ रहे हैं और सरकार स्थिर है. कोई यह कहने वाला भी नहीं है कि हाँ यह दुखद है. जनता अंग्रेजों और मुगलों को तो कोसने में कोई परहेज नहीं करती किन्तु जब लोकतंत्र में लुटेरे शान से लूट रहे हैं और जन जन शांत बैठा है तो इनके लिए मै इससे अच्छे शब्द कहाँ से ढूंढ कर लाऊं. कोई भी देश व्यापी आंदोलन जों किसी एक भ्रष्ट मंत्री का ही इस्तीफा दिलवा सके ना होना निराशाजनक है. आपकी सम्बल देती प्रतिक्रया के लिए कोटिशः धन्यवाद.

mataprasad के द्वारा
27/10/2012

आदरणीय akraktale जी, सादर नमस्कार कूपमंडूक देशवासियों को समर्पित …………

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    माताप्रसाद जी                      सादर, जब कुछ लोग देश हित के लड़ रहे हों और करोड़ों सो ही रहें हो तो फिर मन में इन लोगों के लिए ऐसे ही शब्द जन्म लेते हैं. प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

MAHIMA SHREE के द्वारा
27/10/2012

विहग पशु ढोर चमगादड़,कर रहे जलपान, सूख रहे पोखर सम ही,सुखे उनकी जान / वृक्ष वृन्द खड़े किनारे,चूर मद अभिमान, टूट पर्ण जब गिरे धरा,घटा अरु सब मान//…..आदरणीय अशोक सर .. नमस्कार ..बहुत ही उच्च कोटि की काव्य रचना … छोटी सी पर बहुत बड़ी बात को … साध रही है … बहुत -२ बधाई आपको

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    महिमा जी             सादर, कविता के मंतव्य को समझने और सराहने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया. 

bhanuprakashsharma के द्वारा
27/10/2012

आदरणीय अशोक जी, सुंदर अभिव्यक्ति। 

    akraktale के द्वारा
    28/10/2012

    धन्यवाद आदरणीय भानुप्रकाश जी.

jlsingh के द्वारा
27/10/2012

आदरणीय अशोक भाई जी, नमस्कार! निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर// याद दिलाओ, दिए जलाओ, हाथ मिलाकर. भारत वासी, मत बैठो यूँ होश गँवा कर. प्रिय भाई जी आपकी पीड़ा समझ सकता हूँ … पर आश का दामन छोड़ना चाहिए …. मेरा आशय यही है! बहुत ही बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    आदरणीय जवाहर जी भाई                            सादर, आपकी सुन्दर काव्यात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. आशा करता हूँ आपकी भावनाएं हर दिल तक पहुंचें.

O P PAREEK के द्वारा
26/10/2012

अक्रतालेजी . क्या करना मितवा इनको अब याद दिला कर. भई वाह ! क्या खूब अर्थपूर्ण कविता दी है आपने. साधुवाद .

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    आदरणीय पारिक जी                         सादर प्रणाम, मेरी इस रचना पर आपकी वाह! मेरे लिए आशीष सामान है. हार्दिक आभार.

omdikshit के द्वारा
26/10/2012

आदरणीय अशोक जी, नमस्कार . मुझे कविता का कोई ज्ञान नहीं है .इसलिए मुझे…..अंतिम दो पंक्तिया अच्छी लग रही हैं.बधाई.

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    आदरणीय दीक्षित साहब                           सादर, कविता तो सिर्फ भावनाओं कि अभिव्यक्ति है और मैंने भी वही प्रयास किया है. आपकी सराही गयी पंक्तियों में कूपमंडूक तो हम ही लोग हैं जिसे कुछ लोग मेंगो पीपल भी कहने लगे हैं. हमने सुन्दर सरोवर को पोखर बनते देखा वो भी अब सूख रहा है किन्तु हम आज भी इस बात को लेकर संजीदा नजर नहीं आते कि इस पोखर को पुनः सरोवर बनाएँ, हम उसी में मस्त हैं.आपकी बेलाग प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार.

Rekha Joshi के द्वारा
26/10/2012

आदरणीय अशोक जी निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर//अति सुंदर अभिव्यक्ति ,हार्दिक बधाई

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    आदरेया रेखा जी                       सादर, रचना को सराहने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
26/10/2012

अच्छी रचना

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    यतीन्द्रनाथ जी                    सादर, सराहना के लिए धन्यवाद.

satish3840 के द्वारा
26/10/2012

अशोक जी सादर / क्या खूब एक सूखते पोखर का आपने वर्णन किया हें

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    आदरणीय सतीश जी                            सादर, मेरी भावनाओं को समझने के लिए आपका हार्दिक आभार. 

Santosh Kumar के द्वारा
26/10/2012

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम पीड़ा की बहुत अच्छी अभिव्यक्ति ,…एकदिन यह पीड़ा अवश्य मिटेगी ,..इस विशवास के सिवा कुछ नहीं है ,…कोटिशः आभार आपका

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    भाई जी            सादर, आशावादी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार.

26/10/2012

सादर प्रणाम सर! कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर// जब अंधों को भा गयी अँधेरी नगरी ‘अलीन’ क्या करेंगे कालिख कोठारी में ज्योति जलाकर…………

    akraktale के द्वारा
    27/10/2012

    प्रिय अनिल जी                   सादर, आपका यह शेर भी मेरी बात को ही आगे बढ़ा रहा है. धन्यवाद.

ANAND PRAVIN के द्वारा
26/10/2012

आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम क्या खूब साधा है निशाना सर आपने………… हम पोखर में रहने वाले लोगों के संताप को कहाँ सरकार सुनने वाली है…………जल तो सुखना ही था इससे बहुत ही मेहनत और शब्द संयोजन से बनाई गई आपकी अद्भुत रचना सर…..बधाई आपको

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    प्रिय आनंद जी                  सादर, बाहरी उष्णता कि जगह खुद कि ही गर्मी या करनी से इस पोखर को तो जल्दी ही सुखना है. आपने शब्द संयोजन को सराहा  मै आभारी हूँ. मै निसंकोच यह कह सकता हूँ कि  आपकी काव्य रचनाएँ  बहुत उम्दा होती है और वे अक्सर मुझे प्रेरित करती हैं.धन्यवाद.

    26/10/2012

    भाई प्रवीन जी……………पोखरे का जल सुखा नहीं बल्कि सड़ गया है……………बदबू और दुर्गन्ध आ रहा है….अब कुछ दिनों बाद महामारी भी आएगी…………….दोषी पोखरे का स्वामी नहीं बल्कि.वो बल्कि वो सब स्वार्थी लोग है जो अपने स्वार्थ बस पोखरे के पानी को अमृत समझकर उसे स्थिर कर दिए और उसमे गन्दगी फैलाते गए…..अब उस गन्दगी पर कोई सुवर खाना खोल दे तो उसका भी तो दोष नहीं आखिर वो भी तो अपने पेट के लिए कर रहा है…………मिर्ची लगी न ….चलो जल्दी से पोखरे से एक गिलास गंगाजल निकालों और ……………………हाँ……हाँ….हाँ…………………….तो एक बार प्रेम से बोलिए…………..सड़ी-गली और बदबूदार स्वार्थी भारतीय सामाजिक व्यवस्था की…………….

Rajesh Dubey के द्वारा
25/10/2012

सूखते पोखर से जलचर और जलज का संताप बढ़ना वाजिब है. पोखर और सरकार सूखे की स्थिति में एक जैसी ही होती है. अच्छी कविता.

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    आदरणीय राजेश भाई                        सादर, सच है पोखर के सुखने से वे सभी संताप में आ गये हैं जो इससे जीवन पा रहे थे और वे जो इसके सूखने  पर क्या करना है कि रणनीति नहीं बना सके हैं. कविता को सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार.

yamunapathak के द्वारा
25/10/2012

आदरणीय अशोक जी नमस्कार आज मैंने आपके सभी ब्लॉग पढ़े जो समयाभाव में छुट गए थे.यह बेहद प्रतीकात्मक ब्लॉग है .अंतिम चार पंक्तियाँ रहस्य से परिपूर्ण हैं. सुन्दर

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    आदरेया यमुना जी                     सादर, आपके स्नेह के लिए आभारी हूँ. आपकी इस कविता कि अंतिम कुछ पंक्तियाँ रहस्यमयी लगी किन्तु अब रहस्य कहाँ बचा है पर्ण गिरने से सभी घने वृक्ष अब ठूंठ से नजर आने लगे हैं. प्रतिक्रया के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन.

Santlal Karun के द्वारा
25/10/2012

आदरणीय रक्ताले जी, वर्तमान भारतीय विसंगति पर उक्त व्यंग्यपरक छन्दोबद्ध छोटी-सी रचना के उत्स में विस्तृत गूढ़ार्थ निहित है– “निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर//” ऐसी सार्थक रचना पर हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ !

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    आदरणीय संतलाल जी                             सादर, सारी समस्याएं इस निरीह मृग के ही कारण है जो पैसे पेड़ों पर नहीं उगते, एफ डी आई और कम सिलेंडर जैसे मुद्दों को कई दिनों से कण्ठ में धर कर बैठा था उन्मादित होकर विष वमन किया और पुनः निरीह सा बैठ गया. क्यों नहीं लगातार हो रहे घोटालों पर मुंह नहीं खोल पा रहा है. वक्त निकल कर प्रतिक्रया देने के लिए आपका हार्दिक आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
25/10/2012

आदरणीय अशोक जी, सादर अभिवादन याद तो दिलानी है वृक्ष वृन्द खड़े किनारे,चूर मद अभिमान, टूट पर्ण जब गिरे धरा,घटा अरु सब मान निराशा की जरूरत नहीं. सुन्दर अभिव्यक्ति हेतु बधाई.

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    आदरणीय प्रदीप जी                   सादर, रचना सराहने के लिए हार्दिक आभार. निराशा कहें या आशा हम कूपमंडूक इस पोखर के दलदल में ही प्रसन्न हैं क्योंकि खुद कुछ करना ही नहीं चाहते. मगर इस पोखर के भरोसे जों हरियाए वृक्ष झूम रहे थे उनकी कलाई खुलने से सारी असलियत सामने आ गयी है समय उनकी निराशा का अधिक है. आपकी सुन्दर प्रतिक्रया के लिए पुनः आभार.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
25/10/2012

क्या करना मितवा इनको , अब याद दिलाकर | प्रस्तुति मन को भा गई | मान्य भाई अशोक जी, सादर बधाई ! ” और आप कैसे हैं ? “

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    आदरणीय आचार्य जी                     सादर, रचना आपके मन भायी जानकार प्रसन्नता हुई. हार्दिक आभार. मै कुशल हूँ. आपका कुशलक्षेम लेने के लिए पुनः आभार. इश्वर से कामना करता हूँ यही स्नेह बना रहे. 

भाई साहब ,बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये , बारम्बार आभार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर//

    akraktale के द्वारा
    26/10/2012

    आदरणीय शर्मा जी                       सादर, रचना सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार.

nishamittal के द्वारा
25/10/2012

शुद्ध साहित्यिक भाषा में अभिव्यक्त भावों से युक्त आपको रचना पर बधाई अशोक जी. निरीह मृग यह देख रहा,सब आँख बिछाकर, कोई चपल सा कूद रहा,अरु मौज मनाकर/ कूपमंडूक बैठ गये, सब आस लगाकर, क्या करना मितवा इनको,अब याद दिलाकर// जागते हुए को जगाना बहुत कठिन है.कोई राह निकले बास्क

    akraktale के द्वारा
    25/10/2012

    आदरेया निशा जी                   सादर, मदन छंद आधारित इस व्यंग कविता पर आपका त्वरित आशीष पाकर बहुत प्रसन्नता हुई. हार्दिक आभार.


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