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मीडिया खबरदार!

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PTI8_11_2012_000117A             मीडिया याने टीवी मीडिया, ये मै इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज अमूमन आम आदमी के घर में अखबार तो एक आता है किन्तु टीवी पर समाचार चेनल दस आते हैं. अखबार तो कल कि बासी खबरों को  सिर्फ विस्तार देने का कार्य भर करता है जबकि टीवी लाइव खबरों कि कवरेज देता है. इस मान से आज का सबसे प्रभावी मीडिया समाचार चेनल का मिडिया ही हो गया है. इन समाचार के चेनलों को मै समाचार चेनल से अधिक विज्ञापन चेनल मानता हूँ. यदि समाचार और विज्ञापन के समय कि गणना कि जाए तो यकीन मानिए विज्ञापन के लिए दिया गया समय बाजी ले जाएगा.

                 पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि इन चेनलों का कार्य कलाप बहुत कुछ  आपातकाल के पहले या उस दौरान के अखबारों के सामान हो गया है. ये पूरी तरह से सरकार के हाथों कि कठपुतली बन चुके हैं. जिस पर आम आदमी बहुत भरोसा करता था ऐसे चेनल भी अब सरकार कि भाषा का प्रयोग करने लगे हैं. इसी का नतीजा था कि अन्ना के आंदोलन के बक्त इन समाचार चेनलों को खरी खरी सुनने को मिली. कुछ लोगों द्वारा अपना गुस्सा जाहिर भी किया गया.

                 इसके बाद बारी आयी बाबा रामदेब जी के आंदोलन कि इसमें भी साफ़ देखा गया कि मीडिया सरकारी खुफिया एजेंसी का कार्य कर रही है. जब वे इसमें सफल नहीं हो पाये, इस बार बाबा जी ज्यादा सतर्क थे, इसलिए उन्होंने धीरे से बाबा जी कि कवरेज लगभग समाप्त ही कर दी.

                 अब आज सबेरे से मीडिया सर संघ संचालक मोहन भगवत जी के बयान को सरकारी भाषा में देश के सामने पेश कर रहा था. उसे देख कर लगता है कि शायद देश फिर गुलाम हो गया है या फिर एक बार देश आपातकाल का दंश झेलने वाला है. क्योंकि आज जानेमाने पत्रकार आदनीय आलोक मेहता जी जिस तरह कि भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे उसे देखकर लगा कि शायद स्थितियां ठीक नहीं है.

                  आज मुंबई में भी आसाम के पीड़ितों द्वारा प्रदर्शन के दौरान अचानक आगजनी कि घटना घटी और सारा आक्रोश पुलिस और मीडिया के वाहनों पर उतरा. क्या यह अचानक था? शायद नहीं! क्योंकि जों पीड़ित विस्थापितों के कैम्प में गुजर कर रहे हैं वहाँ के दयनीय हालात को मीडिया ने कभी भी सरकार के सामने उठाने कि जहमत ही नहीं की. क्या यह मीडिया का काम नहीं था या कि मीडिया का काम सिर्फ आसाम में किसी लड़की के जन्मदिन पर राहगीरों से उसके कपडे उतरवाना ही रह गया है. अब उन्ही का चेनल है और उन्ही का माइक है जैसे चाहें सफाई दें. आज मीडिया आसाम के आंदोलनकारियों के  बारे में साफाई देता नजर आया कि रिहायशी कैम्प में रहने वाले मीडिया को क्यों दोषी मान रहे हैं उनकी समस्या उन्हें अपने जनप्रतिनिधियों को बताना चाहिए. वाह रे मीडिया. खुद कि गलती छिपाने के लिए डाल दी अपनी बला जन प्रतिनिधियों के सर. यदि जन प्रतिनिधियों और सरकारी कागजों से काम हो जाता तो फिर आज अन्ना और बाबा को आंदोलन ही क्यों करना पड़ता.मिडीया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यूँ ही नहीं कहा गया है.

                     मीडिया को अब खबरदार हो जाना चाहिए क्योंकि अब वह इंदिरा जी वाला समय नहीं है. वह सदी बदल गयी है. उस वक्त सिर्फ अखबार ही एक साधन हुआ करता था. किन्तु आज यदि मीडिया वाले यदि यह मान लें कि उनके कहे को ही सच मानना जनता कि मजबूरी है तो वह भुलावे में हैं. क्योंकि आज इन्टरनेट और खासकर सोशल नेट्वर्किंग साइट्स उनसे कहीं तेज हैं. इसलिए मै तो यही कहूँगा मीडिया खबरदार!
(चित्र गूगल से साभार.)



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43 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
21/08/2012

मीडिया को अब खबरदार हो जाना चाहिए क्योंकि अब वह इंदिरा जी वाला समय नहीं है. वह सदी बदल गयी है. उस वक्त सिर्फ अखबार ही एक साधन हुआ करता था. किन्तु आज यदि मीडिया वाले यदि यह मान लें कि उनके कहे को ही सच मानना जनता कि मजबूरी है तो वह भुलावे में हैं. क्योंकि आज इन्टरनेट और खासकर सोशल नेट्वर्किंग साइट्स उनसे कहीं तेज हैं. इसलिए मै तो यही कहूँगा मीडिया खबरदार! आदरणीय श्री रक्ताले जी , सादर नमस्कार ! मीडिया को हम हमेशा एक निष्पक्ष एवं ताकतवर लोकतंत्र के स्तम्भ के रूप में देखते आये हैं किन्तु समय समय पर इस पर भी दाग लगे हैं ! आपकी बातों से सहमत हूँ !

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
17/08/2012

रक्तले जी, मीडिया का दायित्व केवल सनसनीखेज और बिकाऊ खबरें देना ही नहीं है बल्कि वह समाज के लिए नैतिक जिम्मेदार भी है। ऐसे में यह जरूरी है कि वह लोगों के हित और सरोकारों को पूरी तरह सोच-समझकर खबरों को दे। शायद यही वजह है कि तमाम टीवी चैनलों के बावजूद अखबारों की लोकप्रियता कम नहीं हुई है क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर वाले यह लोग बेकिंग की तरह बन गए हैं और उन पर लोग तुरंत यकीन नहीं कर पाते हैं और यही साबित कर रहा है कि मीडिया जो जनविश्वास का दर्पण बना था वह दर्पण टीवी चैनलों की करतूतों की वजह से दरक गया है।

ANAND PRAVIN के द्वारा
17/08/2012

आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम मीडिया यानी देश का चौथा स्तम्भ …………बहुत ही खतरनाक स्थिथि में पहुँच चुका है क्यूंकि आज वास्तव में इन्ही के पास वह चाभी है जो झूठ को सच और सच को झूट बना देते है…..और यह उनका puraa faaydaa bhi uthaa rahi है sabse badi baat to यह है ki sab kuch sabse pahle और sabse tez dikhaane waale chanalon के maalikon को bhi ham nahi jaante yadi jaanenge to samajh में aayegaa ki inki asli hakkikat kyaa है……………..bhrshtra देश ki मीडिया jagat bhi bhrasht है………… sarthak muddaa ……….sarthak lekh सर

drbhupendra के द्वारा
16/08/2012

इसका कारण जानने के लिए आप मेरे ब्लॉग ”भारतीय मीडिया आखिर हिन्दू विरोधी क्यों है?खुलासा ” पर हार्दिक आमंत्रित है… आपको निश्चित ही कुछ चौकाने वाले तथ्य मिलेंगे

    akraktale के द्वारा
    16/08/2012

    आदरणीय भूपेंद्र साहब                   सादर अभिनन्दन, मै अवश्य ही आपके ब्लॉग पर आकर उन तथ्यों को पढ़ना चाहूँगा. यदि आपने साथ ही लिकं भी दे दिया होता तो और भी सुविधा होती. आभार.

akashsen के द्वारा
15/08/2012

सादर नमस्कार मिडिया का काम जले पर घी का काम करना है ! मीडिया चैनल तो सभी बिके हुए है! यहाँ चैनल गीतिका ,फिजा कांडा…..के समाचार निर्विघन दे सकती है पर किसी गरीब की भूख पर मिडिया का कैमरा नहीं पहुँचता ! बिना सिर पैर के कितने चैनल है जो समय और पैसे की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं ! आज बच्चो के लिए भी क्या परोस रहा है मीडिया! सिर्फ गुलामी कर रहे है सारे चैनल

    akraktale के द्वारा
    16/08/2012

    आकाश जी             स्वागत आपका, समाचार चेनल सिर्फ गीतिका या फिजा कि ही बात नहीं है ये तो देश में महिलाओ पर हो रहे यौन आक्रमणों को चटखारे ले कर दिखाने का कार्य को ही प्राथमिकता दे रहे हैं. देश कि बदहाली कि दिखाकर उसमे सुधार कि आवाज उठाना ये अपना समय नष्ट करना समझते हैं.  मनोरंजन चेनल कि बात तो करना ही बेकार है. एक वक्त था जब हास्य कार्यक्रम कि बात आती थी तो सारा परिवार साथ बैठकर देखता था किन्तु आज टीवी पर आ रहे एक भी हास्य के कार्यक्रम को क्या हम बच्चों और माता पिता के साथ बैठ कर देख सकते हैं? आपने वक्त निकाल कर प्रतिक्रया दी धन्यवाद.

bhanuprakashsharma के द्वारा
15/08/2012

आदरणीय अशोक जी, मैं आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूं। 

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    आदरणीय भानुप्रकाश जी                       नमस्कार, आपका आलेख पर सहमति दर्शाने के लिए हार्दिक आभार.

chaatak के द्वारा
14/08/2012

इलेक्ट्रानिक मीडिया पूरी तरह से विश्वसनीयता खो चुका है अब वो दिन दूर नहीं जब मीडिया अपनी अंतिम परिणिति को पा जायेगी ये सरकार के गुलाम बनकर रहना चाहते हैं और कुछ ही दिनों में ये सरकारों के मुखपत्र घोषित कर दिए जायेंगे फिर जनता को इनकी ख़बरों में सच्चाई खोजने की आदत अपने आप ख़त्म हो जाएगी| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    चातक जी               सादर नमस्कार, सही कहा है आपने जिस तरह लोगों का दिल्ली दूरदर्शन से मोह भंग हुआ है उसी तरह इन सब से भी हो जाए तो कोई नयी बात नहीं. आपके दूरदर्शी आंकलन के लिए हार्दिक आभार.

s.p.singh के द्वारा
14/08/2012

भाई अशोक जी मैं तो इतना ही कहूँगा की बहुत देर करदी मेहरबाँ आते आते ! खैर देर आयद दुरुस्त आयद ! लेकिन आखिर मीडिया करे तो क्या करे सबके पास एक पापी पेट भी तो है वहीँ यह बात भी सही है की मीडिया कभी भी निष्पक्षता से कार्य नहीं करता अगर अतिउत्साह में कार्य करता है तो फिर २६/११ वाला मुंबई जैसा हाल होता है जब मीडिया लाइव कवरेज के नाम पर हमलावरों के पाकिस्तानी आकाओं की मदद करता दिख रहा था क्योंकि मीडिया की लाइव कवरेज को देख कर पाकिस्तान में बैठे हम्लोवारों के आका उनको सही दिशा निर्देश दे रहे थे इस लिए मेरी समझ के अनुसार मीडिया को निष्पक्ष समझना बहुत बड़ी भूल होगी किसी भी भारतीय के लिए क्योंकि अभी अभी देख लीजिये एम डी एल आर का प्रमुख कांडा पुलिस की पकड़ से दूर है परन्तु मीडिया को उपलब्ध है कारण सब लोग समझ सकते है ?

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    आदरणीय एस पी सिंह साहब                                    सादर नमस्कार, देश कि स्वतंत्रता कि ६५वीं वर्षगाँठ के साथ ही मिडिया के इस देश के लिए कार्य करने कि उम्र भी बढ़ रही है. यदि इतना वयस्क होने के बाद भी वह गलतियां करता है तो इसको क्या कहा जाए. सिर्फ कांडा कि ही बात नहीं है पहले भी ऐसे कई वाकये हुए हैं. और मै तो कहता हूँ हमारे देश में अक्सर होते ही रहते हैं. बिना राजनैतिक प्रश्रय के यह सब सम्भव नहीं है. मीडिया ने देश में हो रहे यौन अपराधों को दिखाने के लिए तो एक समय निर्धारित कर रखा है किन्तु कभी भी देश में जनता कि बदहाली को दिखाने के लिए कोई समय निर्धारित नहीं किया यह स्पष्ट करता है कि मीडिया कि रूचि सिर्फ पैसा कमाने में है.

yamunapathak के द्वारा
14/08/2012

आदरणीय अशोक सर नमस्कार इस मुख्य विषय को ब्लॉग का हिस्सा बना कर आपने बहुत अच्छा किया आपने सच कहा assam के कैंप में रह रहे लोगों की कोई कवरेज नहीं देखी.मीडिया को घटनाओं को सही रूप से जनता के सामने लाना होगा ताकि आम जनता अपनी जिम्मेदारी को समझ पाए.और उचित कदम उठा सके. साभार

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    यमुना जी                सादर नमस्कार, देश के राष्ट्रीय समाचार-पत्र हों या कि समाचार चेनल इनका कर्तव्य है कि देश के हर प्रांत कि घटनाओं से देश को अवगत कराये. किन्तु बड़े शर्म कि बात है कि ये सिर्फ फ़िल्मी दुनिया के अभिनेताओं और देश के नेताओं के इर्द गिर्द घूमते नजर आते हैं. आपकी विचारशील प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

rekhafbd के द्वारा
14/08/2012

आदरणीय अशोक जी ,सादर नमस्ते ,मै आपसे पूर्णतया सहमत हूँ ,मीडिया पर काफी दबाव रहता है और वैसे भी सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर खबरें पहले ही आ जाती है ,आभार

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    रेखा जी           सादर नमस्कार, गलत कार्य करने वाले सदैव् सही कार्य करने वाले कि अपेक्षा अधिक दबाव् में होते हैं, इसीलिए नए विकल्प तैयार होते हैं. खुशी है कि वे इनसे एक कदम आगे हैं. आपका सहमति के लिए आभार.

Chandan rai के द्वारा
14/08/2012

अशोक साहब , आपके आलेख से शब्दश सहमत ! मीडिया को अपने पत्रकारिता धरम का निर्वाहन ठीक से करना होगा !

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    चन्दन जी             सादर नमस्कार, मिडिया भी अपने धर्म का पालन ठीक से नहीं करेगा तो आज सत्ता में बैठे लोग भी शायद कल पछताएंगे. आपके सहमतिपूर्ण आंकलन के लिए धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
14/08/2012

इस पर भी भरोसा नहीं रहा. आदरणीय अशोक जी, सादर अभिवादन

    akraktale के द्वारा
    15/08/2012

    सादर,           यदि इसी तरह एक एक करके सभी लोकतंत्र के स्तंभ ढहते गए तो आने वाली स्थिति चिंता पैदा करने वाली है.धन्यवाद.

meenakshi के द्वारा
13/08/2012

akraktale जी, वास्तव में आपके इस आलेख -” मीडिया खबरदार !” से अब इसको सावधान हो ही जाना चाहिए ; क्योंकि यह सच है- सोशल नेटवर्किंग साइट्स उनसे ज्यादा तेज़ हैं. मीनाक्षी श्रीवास्तव

    akraktale के द्वारा
    14/08/2012

    मीनाक्षी जी              सादर नमस्कार, मेरे आंकलन पर सहमति दर्शाने के लिए आपको कोटि कोटि धन्यवाद.

Mohinder Kumar के द्वारा
13/08/2012

अशोक जी, आप सही कह रहे हैं… जो दिखता है वैसा है नहीं… मिडिया भी स्वतन्त्र रूप से कार्य रत नहीं है उस पर भी कई तरह के दबाव हैं या वह उसी का हिस्सा हैं.

    akraktale के द्वारा
    14/08/2012

    मोहिंदर जी              सादर, बिलकुल सही है मीडिया पूरी तरह दबाव में कांग्रेस के हित को ऊपर रख कर काम कर रहा है. धन्यवाद.

vikramjitsingh के द्वारा
13/08/2012

आदरणीय अशोक जी…..सादर आपके विचारों से पूर्णतया सहमती……

    akraktale के द्वारा
    14/08/2012

    धन्यवाद.

Santosh Kumar के द्वारा
13/08/2012

आदरणीय भाई जी ,..सादर नमस्कार आपकी बात बिलकुल सही है ,..मीडिया चोरों की गुलाम और एजेंट जैसी है ,..उनका एक भ्रम बहुत बड़ा है की जनता उनकी गुलाम है ,काफी हद तक यह सही है ,..लेकिन जनता है सब जानती है ,..मौका पर यही मीडिया गिरगिट की तरह रंग बदलेगा ,…..तब शायद आलोक मेहता जैसे दलाल patrkaarita छोड़ शुद्ध मनोरंजन करेंगे ,..हार्दिक आभार सहित

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    आदरणीय संतोष भाई जी                            नमस्कार, सही कहा है आपने मीडिया शायद यही समझ रही है कि जनता मजबूर है उनकी बातों को सच मानने के अतिरिक्त जनता के पास कोई चारा नहीं है. यह उनकी भूल है. प्रतिक्रया पर आपका हार्दिक आभार.

bharodiya के द्वारा
12/08/2012

खबरदार जनता को होने की जरूरत आ पडी है । खबरदार, जो मिडिया की कही बात को सच माना ।

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    भरोडिया जी भाई                           नमस्कार, दो टूक सत्य बात कहने के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन.

shashibhushan1959 के द्वारा
12/08/2012

आदरणीय अशोक जी, सादर ! मीडिया के सामने देश नहीं फ़िल्मी दुनिया के समाचार प्रमुख हैं ! लेकिन कोई बात नहीं, जनता भी समझ रही है ! यही वजह है की मीडिया के आकलन भी अब गलत हो रहे हैं ! मीडिया अपनी जिम्मेवारी से भले चूक जाय पर जनता नहीं चूकती ! सादर !

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    आदरणीय शशिभूषण जी                             सादर नमस्कार, बिलकुल सही आंकलन है आपका, यदि दोपहर में इन चेनलों को चलाया जाए तो यह कोई नहीं कह सकता कि ये समाचार चेनल है पूरी तरह मनोरंजन चेनल कि तरह कार्य करते हैं. उद्देश्य से भटके हुए अब सरकार के चाटुकार हो गए है. आपकी विचारशील प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार. 

nishamittal के द्वारा
12/08/2012

वर्तमान समय में घटित घटनाओं और राजनैतिक परिस्थितियों में बार बार यही सिद्ध हो रहा है,परन्तु मीडिया भी भ्रष्ट हो चुका है.

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    निशा जी         सादर नमस्कार, लोभ और लायसेंस का उल्लंघन कर दिखाए जा रहे कार्यक्रमों पर कैंची चलने के डर ने इन्हें कर्तव्य से दूर करके भ्रष्ट बना दिया है. आपकी सहमतिपूर्ण प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार.

dineshaastik के द्वारा
12/08/2012

आदरणीय अशोक जी, सादर नमस्कार। पहिले मुझे भी ऐसी आशंका होती थी कि शायद सरकार एवं मीडिया मालिकों के गुप्त समझौते हो गये हैं या फिर उन्हें मीडिया पर बंदिश लगाने वाले कड़े कानून बनाने की धमकी दी गई। इसमें अन्य राजनैतिक दल भी शामिल होगे। लेकिन आपका आलेख पढ़कर मेरी आशंका सच का रूप धारण करने लगी। मुझे यकीन  हो गया मैं जो सोच रहा था वह सच है। मीडिया का सरकारीकरण या यों कहें  राजनीतिकरण हो गया है।

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    आदरणीय दिनेश जी                    सादर, आपको यकीन दिला सका मेरा लिखना सफल हुआ. आप कभी भी समाचार सुनने के लिए समाचार चालु करके देखिये आपको समाचार नहीं विज्ञापन ही चलते हुए मिलेंगे. दोपहर भर आप सिर्फ टीवी के अन्य चेनलों के कार्यकर्म इन चेनलों पर देखेंगे. क्या इसी शर्त के साथ इनको समाचार चेनल का लाइसेंस मिला है? आपने वक्त निकाल कर प्रतिक्रया दी आपका आभार. 

Ramesh Bajpai के द्वारा
12/08/2012

प्रिय श्री अशोक जी आपका यह पैगाम जन जन तक पहुचना चाहिए | अब तो क्षेत्रीय स्तर पर मीडिया जिसका खाती है उसी का गुण गाती है | सत्य से इनका मनो रिश्ता ही ख़त्म होता जा रहा है | शुभकामनाओ सहित

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    आदरणीय बाजपेयी साहब                         सादर नमस्कार, सही है सत्य से टूटता रिश्ता सिर्फ अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाने के लालच में कर्तव्य से दूर होते जा रहे हैं.आभार. 

Rajesh Dubey के द्वारा
12/08/2012

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से देशवासियों को बहुत उम्मीदें थी. ये चौथा स्तम्भ अब धरासायी हो गया है. पैसे के लिए काम करने लगा है.

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    राजेश जी भाई  यही तो चिंता का विषय है. क्या अर्थ रह जाता है निजी समाचार चेनलों का जब वे सरकार कि गुलामी करने लगें.सहमति पूर्ण प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
11/08/2012

adarneey ashok bhai jee, namaskaar! aapka akalan bilkul sahee hai! is baar ke dono jan andolan ke asafal hone ka karan bahut had tak inhe coverage n dena hai. pichlee baar itna inhe coverage mila tha is baar nahee mila! ye sabhee audhyogik gharane kee tarah ho gaye hain, jahan se amdanee dikhee use hee dikhane lag gaye! samyanukool prastuti ke liye abhar!

    akraktale के द्वारा
    13/08/2012

    जवाहर जी भाई सादर नमस्कार, आपका कहना सही है ये औधौगिक घरानों जैसे हो गए हैं और इसी कारण अपने को नुक्सान से बचाने के लिए सरकार के चाटुकारों कि तरह काम करने लग पड़े हैं. सही आकलन एवं समर्थन के लिए धन्यवाद.


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