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इंसान यहाँ पर बिकते हैं.

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(आदरणीय प्रदीप कुशवाहा जी,भरोडियाजी,माताप्रसाद जी,अजय दुबे जी आपने कल मेरी जिस रचना पर प्रतिक्रया दी थी वह मंच से लापता होगई है,मंच के थाने ने रपट लिखा दी है. आज यह छोटी सी रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ शायद कुछ अधूरी सी लगे.कृपया माफ़ करना.)

ये देश गुलामो की बस्ती है

इंसान यहाँ पर बिकते हैं,

बोलियाँ रोज ही लगती हैं,

जिस्मओजान यहाँ पर बिकते हैं,

बदहाली और तंगहाली है,

अरमान यहाँ पर बिकते हैं,

शैतान खुदा बन वैठे जो,

भगवान् यहाँ पर बिकते हैं,

दिल वालों की नगरी है,

दिलदार यहाँ पर बिकते हैं,

बेवफाई का आलम ना पूछो,

वफादार यहाँ पर बिकते हैं,



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59 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bison के द्वारा
11/07/2016

Hi Robin! Thank you so much for your comment. I’m working hard to get the book done as soon as possible. Do2&#8n17;t want to disappoint my readers! Hope the poppy seed chicken was delicious and your husband enjoyed it! Blessings, Sara

lucky hussain के द्वारा
16/09/2014

hi aish hai jha par sabkuch khula h koi ki nhi sunta h

Himanshu Nirbhay के द्वारा
04/09/2012

इंसान यहाँ पर विकते हैं, ईमान यहाँ पर विकते हैं खुदगर्जी का आलम ये मेहमान यहाँ पर विकते हैं….. उत्कृष्ट रचना अशोक भाई….

manoranjanthakur के द्वारा
30/07/2012

आप ने याद रखा बहुत बधाई

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
29/07/2012

देखन में छोटन लगे गाव करे गंभीर ! गागर में सागर !! कवितान्तार्गत सूक्तियों के लिए हार्दिक आभार ! अशोक जी! वफादार गर बिक ही गया तो वफादार किस बात का ? साभिवादन !!

    akraktale के द्वारा
    05/08/2012

    धन्यवाद.

rajanidurgesh के द्वारा
22/07/2012

अशोकजी नमस्कार सच है यहाँ सबकुछ बिकाऊ है. देश,समाज,शहर , गाँव सब व्यापारियों की तरह वयवहार करते हैं. यहाँ सब कुछ बिकता है. माँ का प्यार कमाऊ बेटे को मिलता है. कमाऊ पत्नी अच्छी लगती है. पति अगर नहीं कम सके तो पत्नी भाग जाती है. सच है सबकुछ बिकता है. अति सुन्दर.

    akraktale के द्वारा
    23/07/2012

    रजनी जी सादर नमस्कार, नैतिकता सिकुड़ती ही जा रही है, इसी विडंबना पर लिखी यह रचना आपको भली लगी मेरा उत्साहवर्धन हुआ धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
20/07/2012

आदरणीय अशोक जी , सादर अभिवादन बस खरीद दार चाहिए. बधाई. मेरे स्वास्थ्य के प्रति चिंता व्यक्त करने हेतु आभार.

    akraktale के द्वारा
    20/07/2012

    आदरणीय प्रदीप जी सादर नमस्कार, आप जैसे सभी ब्लोगर साथियों साथ के लगाव के कारण बीमार होने पर चिंता होना स्वाभाविक है, मुझे ख़ुशी है आप पुनः लेखन कार्य कर रहे हैं. प्रतिक्रया देने के लिए समय निकालने के लिए आपका ह्रदयतल से शुक्रिया.

yogi sarswat के द्वारा
20/07/2012

बदहाली और तंगहाली है, अरमान यहाँ पर बिकते हैं, शैतान खुदा बन वैठे जो, भगवान् यहाँ पर बिकते हैं, आदरणीय श्री रक्ताले साब ! बहुत ही सुन्दर , सोचनीय और सटीक शब्द !

    akraktale के द्वारा
    20/07/2012

    योगी जी सादर, रचना की पंक्तियों पर स्नेह बरसाने के लिए धन्यवाद.

smtpushpapandey के द्वारा
19/07/2012

आदरणीय रक्ताले जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने मुझे प्रतिक्रिया दी और लेख पसंद किया आपका बहुत बहुत आभार आपकी रचना बढ़िया लगी बहुत बढ़िया काव्य धन्यवाद श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

    akraktale के द्वारा
    20/07/2012

    श्रीमती पुष्पा पाण्डेयजी सादर नमस्कार, समय निकालकर रचना पढने के लिए धन्यवाद.

Punita Jain के द्वारा
18/07/2012

आदरणीय अशोक जी, आज आपके ब्लॉग पर आई तो पता चला आपकी यह रचना पता नहीं कैसे पढ़ने से छूट गई | इस रचना की हर पंक्ति इतनी खूबसूरत है कि शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता |

    akraktale के द्वारा
    20/07/2012

    पुनीता जी सादर नमस्कार, रचना पसंद करने के लिए धन्यवाद.

yamunapathak के द्वारा
14/07/2012

नमस्कार सर,पुरे एक महीने बाद आपकी रचना मिली.और हमेशा की तरह बेहद खुबसूरत रचना है पुरी सच्चाई बयान करती हुई बेबाक विचारों के साथ. आजकल प्रदीप सर की कोई रचना नहीं आ रही है. बदहाली और तंगहाली है, अरमान यहाँ पर बिकते हैं, इस पंक्ति ने सर्वाधिक आकर्षित किया. धन्यवाद सर

    akraktale के द्वारा
    15/07/2012

    यमुना जी सादर नमस्कार, समय की थोड़ी तंगी रहती है. जितना वक्त मिलता है उसमे लिख लो या पढ़ लो. मै पढने को वरीयता देता हूँ इसलिए कम ही लिख पाता हूँ. जैसा की मैंने लिखा भी है मेरी एक रचना पोस्ट होने के बाद गायब हो गयी. इस रचना को मैंने कुछ शीघ्रता में पोस्ट किया है, इस पर आपके ही साथ अन्य साथियों की सराहना मिलने से मुझे संतोष हुआ. धन्यवाद. आदरणीय प्रदीप जी की साहित्य संगम के मंच पर तो लगातार उपस्थिति दिख रही है किन्तु अस्वस्थता के कारण शायद उनकी कोई रचना जेजे पर नहीं आ पा रही है. उम्मीद है वे शीघ्र ही लिखेंगे. वे शीघ्र अपने स्वस्थ होने का शुभ समाचार देंगे ऐसी आशा है.

sinsera के द्वारा
14/07/2012

आदरणीय अशोक जी, नमस्कार, 12 लाइन की कविता को 36 कमेंट्स मिले हैं , क्या अभी मेरे लिए कहने को कुछ बचा है… ये ज़रा सी कविता सब का दुःख दर्द समेटे हुए है…(hence proved)

    akraktale के द्वारा
    15/07/2012

    सरिता जी सादर नमस्कार, आपने रचना पढ़ी,मर्म को समझा यही सफलता है. प्रतिक्रिया देने का शुक्रिया.

ajaykr के द्वारा
13/07/2012

श्रीमान जी ,प्रणाम छोटी सी किन्तु दमदार कविता हैं श्रीमान जी … सामाजिक स्थिति पर लिखा हैं ,आपने पर ज्यादा बेहतर होंगा की हमे अपना ध्यान सकारात्मकता पर रखना चाहिये ,पर सच्चाई से भी मुह नही मोड़ा जा सकता , http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    akraktale के द्वारा
    15/07/2012

    अजय जी सादर नमस्कार, समाज के प्रबुद्धजनो से मुझे यही आशा है. धन्यवाद.

minujha के द्वारा
12/07/2012

बेवफाई का आलम ना पूछो, वफादार यहाँ पर बिकते हैं, वर्तमान की दुर्दशा का यही तो कारण है रक्ताले जी छोटी पर बहुत कुछ कहती रचना

    akraktale के द्वारा
    15/07/2012

    मीनू जी सादर नमस्कार, सहमतिपूर्ण प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
12/07/2012

बहुत खूब…. आदरणीय रक्ताले साहब, सादर प्रणाम वर्तमान की वास्तविकता को दर्शाती सुन्दर प्रस्तुति. रचना छोटी है तो क्या हुआ… देखन में छोटन लगे…घाव करे गंभीर…. यह गायब होने वाली घटनाओं पर भी जे. जे. को ध्यान देना चाहिए… काफी तकलीफ होती है जब कोई रचना गायब हो जाये या फिर दी हुयी प्रतिक्रिया गायब हो जाये… कहीं न कहीं तो तकनिकी त्रुटी है नहीं तो कंप्यूटर से अपने आप कुछ भी गायब नहीं होता….

    akraktale के द्वारा
    15/07/2012

    आदरणीय अजय जी नमस्कार, सही कहा आपने त्रुटी पर जेजे को ध्यान देना चाहिए. रचना पर सकारात्मक प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

seemakanwal के द्वारा
11/07/2012

रक्ताले जी सादर नमस्कार ,इन्सान यहाँ बिकतें हैं . संसार बाज़ार बन गया ,हर शख्स खरीदार बन गया

    akraktale के द्वारा
    12/07/2012

    सीमा जी सादर अभिवादन, हालात इस कदर बदतर हो चले हैं की इंसान को अपना सम्मान गिरवी रखकर बार बार बिकना पड़ रहा है. हर तरफ भ्रष्टाचार पसरा है. सारी जीवनोपयोगी सेवायें व्यापार हो गयी है, खरीदोगे नहीं तो क्या जी पाओगे? आपके समर्थन का शुक्रिया.धन्यवाद.

Rajkamal Sharma के द्वारा
11/07/2012

आदरणीय अशोक जी …..सादर अभिवादन ऍ लाखों गम हुए है यहाँ उनका ना अब तलक पता चला है आपका वोह लेख भी पहले से गुम हुए लेखों में जा मिला है एक बार जो गया वहां पर फिर लौट कर यहाँ आता नहीं जागरण थाणे के पास गुमशुदा की कोई फ़ाइल नहीं कोई खाता नहीं इस गागर में सागर को पढ़ कर मन आनंदित हुआ मुबारकबाद

    akraktale के द्वारा
    12/07/2012

    आदरणीय राजकमल जी सादर नमस्कार, अवश्य ही आपका मंच पर अनुभव बेहतर है. चलो कोई बात नहीं रचना मेरी डायरी में तो है किन्तु उसकी मंच पर प्रस्तुति के लिए की गयी कांट छांट पुनः करने से बचने के लिए मैंने उसे फिर से पोस्ट नहीं किया. सावन तो दगा बाज था ही मंच ने भी दागा दे दिया. आपके लिए उस रचना की कुछ पंक्तिया पेश कर रहा हूँ आशीष दें. हाथ मालेगा मानव जब तोता हाथ से उड़ जाएगा, विनाश प्रकृति का कर क्या मानव कभी जी पायेगा, रोयेगा और पछतायेगा सामीप्य प्रकृति का खोकर, अमृत सी बहती नदियों क्यों विष तू घोल रहा है, आज मन आस का पंछी बन फिर बोल रहा है………………

ANAND PRAVIN के द्वारा
11/07/2012

आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम आपकी रचना छोटी नहीं हो सकती सर ………….. बहुत ही धारदार रचना कम शब्दों में ही काफी कुछ कहा है आपने उम्मीद है की बाकी की रचना भी पढने को मिल पाएगी आपका प्रिय

    akraktale के द्वारा
    12/07/2012

    प्रिय आनंद जी नमस्कार, सर्व प्रथम तो आपको वैवाहिक जीवन के मंगलमय होने के लिए शुभकामनाएं. कोई विधिवत जानकारी तो नहीं है किन्तु जो मंच पर पढ़ रहा हूँ उससे यही जान पा रहा हूँ. मन की खिन्नता शब्दों में बाहर आती है यदि यही हालात रहे तो एक बार नहीं बार बार आपको यही सब तो पढने मिलेगा. रचना की सराहना के लिए धन्यवाद.

Mohinder Kumar के द्वारा
11/07/2012

अशोक जी, नमस्कार, सही कहा आपने आज वो समय आ गया है जब सब कुछ बिकाऊ हो गया है बस कोई कीमत लगाने वाला हो. बस फ़र्क सिर्फ़ इतना है कुछ मजबूरी में बिकते हैं और कुछ खुशी से..किसी चाह में.

    akraktale के द्वारा
    12/07/2012

    मोहिंदर जी नमस्कार, सही कहा आपने कुछ मजबूरी में बिकते हैं गुनाहगार तो हालत पैदा करने वाला है.और आज देश में हर किसी के सामने यह रोज रोज पेश आ रहे हैं.विचारणीय प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
11/07/2012

आदरणीय अशोक भाई जी, नमस्कार! शैतान खुदा बन वैठे जो, भगवान् यहाँ पर बिकते हैं, आपकी इस रचना की जितनी प्रशंसा की जाय कम है ! बहुत धारदार रचना ! और सत्य भी ! क्या नहीं बिक रहा है ! बस कीमत देनेवाला होना चाहिए ! बहुत सुन्दर ! सादर ! आभार !

    akraktale के द्वारा
    12/07/2012

    जवाहर जी भाई नमस्कार, बस आपको रचना अच्छी लगी मेरा लिखना सफल रहा. धन्यवाद.

Rajesh Dubey के द्वारा
11/07/2012

देश में इमान,प्रेम, भाईचारासब कुछ बिकने लगा है.कविता छोटी है पर सुन्दर है.

    akraktale के द्वारा
    12/07/2012

    धन्यवाद राजेश जी.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
10/07/2012

वफादार ही जब बिकने लगे तब देश को बिकने में कितना समय लगेगा। अत्यंत सुंदर रचना.

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    आदरणीय सिंह साहब नमस्कार, आपका स्वागत है मेरे ब्लॉग पर. भ्रष्टाचार चरम पर है खरीदार की डिमांड पर हर चीज बिक रही है. सहमती पूर्ण प्रतिक्रया के लिए आभार, धन्यवाद.

shashibhushan1959 के द्वारा
10/07/2012

आदरणीय अशोक जी, सादर ! कुछ विचित्र सा तो हो रहा है मंच पर ! कभी किसी की टिपण्णी गायब हो जा रही है, कभी रचना ही गायब हो जा रही है, अभी मैं फीडबैक पर गया तो वहाँ श्री दिनेश जी के प्रश्न के उत्तर में श्री अनिल जी द्वारा स्पस्टीकरण दिया गया है, परन्तु नीचे “धन्यवाद, जागरण जंक्शन परिवार ” लिखा हुआ है ! किसी पर टिपण्णी चार है, स्टार रेटिंग चौदह ! बहरहाल, जे० जे० टीम इसपर ध्यान देगी ! आपकी इस रचना की जितनी प्रशंसा की जाय कम है ! बहुत धारदार रचना ! और सत्य भी ! क्या नहीं बिक रहा है ! बस कीमत देनेवाला होना चाहिए ! बहुत सुन्दर ! सादर !

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    आदरणीय शशि जी सादर नमस्कार, सही कहा अपने कई छोटी छोटी बातों को तो हम नजरअंदाज करते ही हैं किन्तु कोई पोस्ट ही गायब हो जाए तो इसे क्या कहें. रचना पर आपके आशीर्वाद से प्रसन्नता हुई. धन्यवाद.

allrounder के द्वारा
10/07/2012

नमस्कार रक्तले जी, बहुत बढ़िया ” बे-बफाओं की बात करें क्या, बफादार यहाँ पर बिकते हैं “! आभार आपका !

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    सचिन जी नमस्कार, आपकी सराहना ही संबल है. आभार.

roshni के द्वारा
10/07/2012

अशोक जी नमस्कार… यहाँ हर कोई खरीदार बना यहाँ हर कोई बिका बाजारों में, अब माली भी करेगा क्या जो बाग़ उजाड़ गया बहारों में .. बहुत सुंदर भाव प्रस्तुत किये आपने… आभार..

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    रौशनी जी सादर नमस्कार, बहुत सुन्दर पंक्तियों से आपने हौंसला बढ़ाया है. अब माली भी करेगा क्या जो बाग़ उजाड़ गया बहारों में .. वाह! धन्यवाद.

satish3840 के द्वारा
10/07/2012

अशोक जी बहुत ही खूब / आपने रचना से पहले रचना के मंच से लापता होने व् मंच के थाने ने रपट लिखा देने की बात लिखी हें / ये आजकल में अपने साथ भी देखता हूँ / प्रतिकिया ब्लॉग पर आती नहीं / कभी पोस्ट भी गायब हो जाती हें / अच्छी रचना के लिए धन्यवाद

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    आदरणीय सतीश जी नमस्कार, सही कहा आपने कई छोटी छोटी बातों को तो हम ध्यान देते ही नहीं हैं. किन्तु मैंने अपनी रचना कुछ एडिटिंग के कार्य से सेव करके रख दी थी दुसरे दिन गायब और गजब तो तब हो गया जब पोस्ट ही गायब होगई. अभी तक तो जेजे से कोई जवाब नहीं आया है आयेगा भी कोई घिसा पिटा जवाब बेहतर है आगे से खुद ही ध्यान रखना. रचना पसंद करने के लिए आपका शुक्रिया.

bharodiya के द्वारा
10/07/2012

अशोक भाई नमस्कार अशोक भाई , बिकने में अब चड्डी बाकी बची है । क्या होगा……

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    भरोदिया जी भाई नमस्कार, आपकी जानकारी का अभाव है वरना मैंने तो कुछ दिन पहले ही बिकने का समाचार सुना था. धन्यवाद.

10/07/2012

सादर प्रणाम! ये देश गुलामो की बस्ती है इंसान यहाँ पर बिकते हैं, बोलियाँ रोज ही लगती हैं, जिस्मओजान यहाँ पर बिकते हैं, बदहाली और तंगहाली है, अरमान यहाँ पर बिकते हैं, शैतान खुदा बन वैठे जो, भगवान् यहाँ पर बिकते हैं, दिल वालों की नगरी है, दिलदार यहाँ पर बिकते हैं, बेवफाई का आलम ना पूछो, वफादार यहाँ पर बिकते हैं,…… और यहाँ ठंडी रातों में नंगे बदन सिकुड़ते हैं, गर्मी के तपिश में, भूखे पेट तपते हैं, बारिश के मौसम में, प्यासे होठ तरसते हैं, यह सब देख यहाँ कुछ रोते हैं और कुछ हँसते हैं, कुछ जलते हैं और कुछ बुझते हैं,………………………… आगे भी बहुत कुछ हैं अभी, जो अपनी आखों से देखते हैं, पर बन तमाशाई, खुद तमाशा बनते हैं………………!

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    प्रिय अनिल जी नमस्कार, आपने मेरी रचना को विस्तार दिया. धन्यवाद. रचना की कई पंक्तियाँ एडिट ना होने के कारण मैंने इसको छोटा ही रखना बेहतर समझा. ख़ास आपके लिए ये पंक्तिया सादर कर रहा हूँ इन पर भी अपना स्नेह दें.धन्यवाद. घूंस – घोटालों में जो बदनाम हुए वो नाम यहाँ पर बिकते हैं, हर सम्मानित तो अपमानित है और सम्मान यहाँ पर बिकते हैं, जो लिए फटी झोलियाँ राशन की वो आम यहाँ पर बिकते हैं, विदेशों में देशद्रोही को हम ढूंढ़ रहे गुमनाम यहाँ पर बिकते हैं,

Chandan rai के द्वारा
10/07/2012

अशोक जी , मैंने भी कल आपका आर्टिकल देखा था ,और सोच था समय निकालकर तसाल्ली से पढूंगा , पर आज सुबह देखा तो रचना मिली ही नहीं , पर आपने उसकी कमी इस बेहतरीन रचना से दूर कर दी ! दिल वालों की नगरी है, दिलदार यहाँ पर बिकते हैं, बेवफाई का आलम ना पूछो, वफादार यहाँ पर बिकते हैं,

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    आदरणीय चन्दन जी नमस्कार, मैंने एक बार जेजे द्वारा लिखा गया सन्देश पढ़ा था जिसमे उन्होंने अपने सिस्टम को बहुत उम्दा बताया था, इसी उम्दा सिस्टम के सहारे मै बेफिक्र था रचना को कहीं और सेव नहीं किया. चलो एक बार की गलती जीवन भर का सबक. आपने इस छोटी सी रचना को सराहा मुझे चैन आया. धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
10/07/2012

अशोक जी आपकी रचना की सराहना करने के लिए शब्द नहीं खोज पा रही हूँ..सब कुछ बिकता है,बस क्रेता और मुद्रा चाहिए,

spdimri के द्वारा
10/07/2012

बेवफाई का आलम ना पूछो, वफादार यहाँ पर बिकते हैं, बेहद  सटीक  ब्यंग युक्त प्रहार  ..शुभ कामनाएं एवं बधाईयां सादर !!!

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    प्रकाश जी धन्यवाद.

dineshaastik के द्वारा
10/07/2012

अशोक जी सादर नमस्कार, सच को बयां करती रचना, सचमुच इस मंडी में सब कुछ बिकता है। बस आपके पास कीमत होना चाहिये। सराहनीय प्रस्तुति के लिये बधाई…..

    akraktale के द्वारा
    11/07/2012

    आदरणीय दिनेश जी नमस्कार, रचना पसंद करने का शुक्रिया.


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