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28 Posts

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akraktale


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अतीत के कोने.

Posted On: 13 Feb, 2012  
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कविता जनरल डब्बा में

54 Comments

नया सवेरा!

Posted On: 12 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

49 Comments

बसंत

Posted On: 27 Jan, 2012  
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कविता जनरल डब्बा में

56 Comments

एक अधूरी ख्वाहिश.

Posted On: 25 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

45 Comments

ऋतू गान.

Posted On: 13 Jan, 2012  
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कविता पॉलिटिकल एक्सप्रेस हास्य - व्यंग में

50 Comments

नव वर्ष मुबारकबाद!

Posted On: 30 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

32 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम ये बाते बेकार की बाते नहीं हो सकती और आप या कोई भी भारतीय का कहीं ना कहीं इन बातों को लेकर रोष रहता ही है आपने शिक्षकों के बारे में जो कहा वो बिलकुल सही है, आज देश के ज्यादातर राज्यों में कमोबेश यही स्तिथि देखने को मिलती है शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा चुनाव सर्वेक्षण और पल्स पोलियो के ड्रॉप में ज्यादा वेअस्त है उनकी भी मजबूरी है क्यूंकि ये उनका काम नहीं है जिस बात का उनपर अतिरिक्त दवाओं बनाया जा रहा है फिर आज एक शिक्षक पढ़े अथवा नहीं उसे इस बात का ध्यान रखना होता है की खिचड़ी बनी की नहीं ..............दुर्भाग्यपूर्ण है ये सब राईट तो रिकाल का कांसेप्ट तो अच्छा है किन्तु ये सामाधान नहीं है मेरे मत में आपका बहुत ही उत्कृष्ट लेख ............................ लगता है १४ तारीख को आपने आंटी जी को कोई तोहफा नहीं दिया था इसलिए आपके टीवी देखने पर गुस्सा हो रहीं है ...........अभी भी वक़्त है जा के कोई अच्छा सा तोहफा ले आइये ............हा हा हा

के द्वारा: ANAND PRAVIN

के द्वारा: surendr shukla bhramar5

अब तक मेरी गरदन हाँ हाँ करके दुखने लगी थी और पेट भी भर गया था कुछ खाने से और कुछ पत्नी की बेकार की बातों से. ...... .हा हा हा सच में अगर आपकी पत्नी आपकी ये लेखनी देखे तो आपको कम से कम दो दिन तक खाना खुद बना कर ही खाना पड़ेगा ,वैसे ये किस्सा हर घर की डिनर टेबल का है ! सच में रोज़ रोज़ चुनाव में व्यस्त ये नेता कब जनता की परेशानी को समझ सकेंगे .चुनाव से ज्यादा इन्हें अपनी जेब में आने वाले फंड की चिंता रहती है गिनती शुरू हो जाती है ,कितनी कमाई की जा सकती है ,नेता योजनाये भी जनता की भलाई के लिए नहीं बनाते ,वो तो नेताओं की कमाई के स्रोत होते है !इन चुनावों में कितने धन की बर्बादी होती है ,और उसका सारा भार जनता की जेब पर ही पड़ता है

के द्वारा: D33P

नमस्कार अशोक जी, अपनी संस्कृति का दंभ तो हमें रहना ही चाहिए किन्तु यह ध्यान भी रखना होगा कि हम उसके संरक्षण के प्रति कितने सचेत हैं। जो नया है और अच्छा है उसे तो अपनाना ही चाहिए है पर जो पुराना किन्तु बेहतर है उसे भूलना भी नहीं चाहिए। अतीत अच्छा था तो उससे प्रेरणा ले कर भविष्य को भी और अच्छा बनाने का संकल्प हमें लेना होगा। आज हम कहाँ हैं यही तय करता है कि कल हम कहाँ होंगे। प्रेम के विषय में यह कहूँगा कि पश्चिम ने भले ही इसे एक दिन या सप्ताह विशेष तक सीमित मान रखा हो मगर यह भावना तो सदा से ही है और हमेशा ही रहेगी यह तो सर्व व्याप्त है। इस उदात्त भावना की व्यापकता को समझने के लिए इसका एक अंग होना अनिवार्य है। सादर एवं साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी

आदरणीय अशोक जी .... सादर अभिवादन ! वोह सुनहरी सुबह कभी तो आएगी - जरूर आएगी - हम होंगे कामयाब एक दिन पूरा है विश्वाश एक दिन .... सुनहरे अतीत का गुणगान करके हम सिर्फ अपने पूर्वजो का ही गुणगान कर रहे है ..... कोई बड़ा काम खुद करना और सोचना हमारे लिए इतना जरूरी नहीं .... इसलिए यही कहना चाहूँगा की ऐ मेरे वतन के लोगों बाते कम काम ज्यादा (खास कर औरतो से ) हर तरफ प्यार का ही खुमार छाया रहे हमेशा इसी कामना के साथ आशा से भरपूर मुबारकबाद सहित :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: rajkamal

इस विषय मे मेरा मत है की इंसान को अपने जीवन मे एक बार शांति से बैठ कर अपने अतीत मे देखना चाहिए की उसने क्या क्या गलतियाँ की..... और उनसे उसने क्या सबक लिए ..... अगर कोई सबक लिए तो वो गलती शिक्षक की भाति है... और अगर नहीं लिए तो उसके क्या दुष्परिणाम हुए..... फिर आज अभी उसे ये सोचना चाहिए की वो ऐसी कोई गलती न करे की जब भविष्य मे वो अपना अतीत देखे तो फिर पछताए....... और जहां तक जीवन की बात है तो जीवन भूत या भविष्य मे नही है...... जीवन वर्तमान मे है..... जीवन आज है और अभी है...... अगले पल का कोई भरोसा नही....... अगर आपका वर्तमान अच्छा है तो भूत भी अच्छा हो जाएगा........ क्योकि आने वाले कल मे आपका आज भूत काल हो जाएगा....... और अगर आज अच्छा है तो निश्चित ही भविष्य स्वयं ही अच्छा हो जाएगा......... सबके अपने अपने मत है......... इसलिए अन्यथा कुछ न लें......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

के द्वारा: Rakesh

अशोक जी आपका ब्लॉग पढ़ा -" मतदान की प्रक्रिया में अन्ना फैक्टर कितना प्रभावी सिद्ध हो सकता है?अच्छा लगा / अन्ना ने सन्देश तो अच्छा दिया पर चुनाव में क्यों की अन्य मुद्ददे भी हावी होते हें , जिसमें जात पात का मुद्दा मुख्य हें / तो में ये कह सकता हूँ की अन्ना फेक्टर शायद अब वो काम नहीं करेगा जो आदोलन की समय करना चाहिए था / फिर भी जनता व् सभी राजनेतिक दल दागी उमीदवार को लेकर सचेत हें / बीजेपी में कुशवाहा के मामले में देखा जा सकता हें / विरोध तो अच्छी बात का भी होता हें / यदि अन्ना का हो तो बड़ी बात नहीं / आपके विचार अच्छे लगे/ ये बात भी सही हें की जनता जो दिखता हें वो बिकता के सिधांत पर चलती हें / यदि अन्ना चुनाव में प्रचार करते तो गर्म लोहे पर चोट करना जेसा होता / अन्ना के चुप रहने से लोकपालव् भ्रटाचार के मुद्दे शायद कमजोर पद गए / मीडिया भी चुप हो गया /

के द्वारा: satish3840

आदरनिये अशोक सर,सादर प्रणाम आपके द्वारा लिखी गई सभी तर्क सत्य है किन्तु अन्ना क्यूँ प्रभाव हिन् हो गए और हम पर उन्होंने कितना प्रभाव छोड़ा है ये आपही की इस लाइन से स्पष्ट हो जाता है की............................................................. " जनता तो सूर्योदय और सूर्यास्त को ही ठीक मानती है क्योंकि उसको प्रथ्वी का घूमना दिखाई ही नहीं देता वह तो जो देखती है उसी को सच मानती है." जनता का बिलकुल सही मूल्याङ्कन किया है आपने, जनता हमेसा चाहती है की कोई चमत्कार हो और अन्ना कोई अलोकिक काम करते रहें ताकि वो समाचार में इस्सका मजा ले सकें .......................................................................बहुत ही सार्थक लेख आपका .......सिर्फ कांटेस्ट में पोस्ट होने के कारण देर से देख पाया इस्सके लिए क्षमा चाहूँगा ............धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

के द्वारा: akraktale

के द्वारा: Rakesh

के द्वारा: omprakash pareek

आप को ऐसा नही लगता की भारत भूमि के पानी में ही खराबी है । बिना पानी की औलादें पैदा किये जा रही है । आप को ऐसा नही लगता की जनता भैंस के समान हो गई है । पिछली बार अन्ना मुश्किल से उसे पानी के बाहर लाये थे । आज फिर पानी में बैठ गई । आप को ऐसा नही लगता की जनता गधे के समान हो गई है । रात दिन गधे की तरह काम करो, मेहंगाई, घूस देने के लिए थोडा और काम कर लो । दिन कट जाएंगे । आप को ऐसा नही लगता की जनता कुत्ते के समान हो गई है । मालिक बिस्किट फैंकता है तो कुत्ते सी वफादारी दिखने दौडता है । आज दिखा दिया कुत्तापन, अन्ना को कले झंडे दिखा कर । चायना में जब राजाशाही थी तब एक राजा मर गया । उस के ५ साल के बच्चे को राजा बना दिया । उस बालाराजा को ईत्र से भरे बर्तन में संडस आदी करवाया जाता था । बर्तन दरबार में धुमाया जाता था । सब दरबारी उसे सुंघते थे और अपनी वफादारी दिखाते थे । आप को ऐसा नही लगता की भारत का भी ऐसा ही हाल है । जनता जवाहरलाल के बच्चों का सब कुछ सुंघ रही है । आप को ऐसा नही लगता की जनता गुलाम है और उसे गुलाम ही रहने देना चाहिये । गुलामी के लायक ही है ।

के द्वारा: bharodiya

अशोक जी नमस्कार, आपने बिलकुल सही कहा है की ये कोई धमकी नहीं आक्रोश है . हम नेता चुनते हैं ताकि हमारे देश का कुछ हित हो जो निम्न और उच्च वर्ग का भेद है वो ख़तम हो लेकिन ये भेद ख़तम होने की बजे बढ़ता जा रहा है . पहले दो ही वर्ग होते थे अब कई वर्ग हो गए हैं वो इसीलिए नहीं की हम गरीब हैं ,या हमारा देश विकसित नहीं हो रहा है वो वर्ग इसीलिए बढे हैं क्यूंकि हमारे चुने गए नेता देश की तरक्की को भूल कर खुद की तरक्की में जुट गए हैं . और अब अगर जनता जागना चाहती है कुछ इसके खिलाफ करना चाहती है तो उसको धमकी का नाम दिया जा रहा है .... ऐसे हम सबका का एक ही कर्तव्य बनता है की खुद को भ्रस्टाचार से दूर रखें और जहाँ तक हो सके इसमें सहयोग दें ... धन्यवाद...

के द्वारा: mparveen

अशोक भाई नमस्कार ये लिंक है वो ईसी टाईटल पर है लेकिन वो ऍंटिअन्ना है । मैने कोमेंट लिखा । काफी लोगों को मेरा कोमेंट अच्छा नही लगता hai | ईन को भी नही लगा । दो बार ट्राई किया लेकिन स्विकारा ही नही । क्या क्या हो रहा है जरा ध्यान से देखिए । यहां पर लगाया है । http://satish3840.jagranjunction.com/2011/12/26/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE/#comment-19 आपने शालीनता की बात कही । जब चोर शालीनता से चोरी करने लगते हैं तो पकडनेवाला शालिनता दिखाए तो चोर भाग जाता है । और चोरी करनेवाला तो ऊंची आवाज निकाल ही नही सकता, पकडने वाला ही चिल्लाता है चोर !! चोर !!! पकडो ! पकडो ! तभी पडोसी जागेगा न, भाई । 3. क्या टीम अन्ना को सरकारी लोकपाल से सहमत हो जाना चाहिए?- (((टीम अन्ना को भी अपनी सीमा में रहना चाहिए / उसने ये केसे समझ लिया कि उनकी बात से सब सहमत ही होगें / अतः अन्ना के सहमत होने के साथ साथ पुरे विपक्स को भी सहमत होना चाहिए / जनता को भी सहमत होना चाहिए / आखिर २०० से ४०० करोड़ का खर्च जो लोकपाल पर होगा वह आम जन की जेब से जायेगा / करोड़ों रूपये जनकल्याण से निकल केवल नॉन प्लान्ड बजट पर खर्च हो जायेगें /))) चोर पोलिस की पकडा पकडी में सीमा होती है ? हाथ ही पकडना, कान मत पकडना, कमाल है भाई । अन्ना टीम ऐसे ही नही आ गई है । जनता के साथ मिलकर बहुत होमवर्क किया है, जनता को भाव पहले से ही दे दिया है । जनता को पहले से ही बताया गया है अडियल रवैया अपनाना पडेगा तब ही काम हो सकता है । वरना ये कानून पिछले ४० साल से लटक रहा है वो अगले ४०० साल में भी नही बनेगा । कानून का खाका बना के दिया वो जनता के ८० प्रतिशत हीस्से ने मान लिया है जो नही मानता वो २० प्रतिशत जनता भ्रष्टाचारी लोग है या उन के खरिदे हुए बुध्दिजीवी और मिडिया या वो भी जो खुद अन्ना बनना चाहेते हैं । अबतक वो मरे पडे थे, अन्ना का काम आगे बढा तो दोगाना शादीमें अब्दुला दिवाना बन के आ गये, टांग अडाने । मेरी भी सुनो, मेरी भी सुनो । क्यों सुने अन्ना और क्यों सुने जनता । पक्ष और विपक्ष दोनो को सुनना नही है अन्ना का पहले से ही प्लान था । चोर को चोर पकडने के कान्नून में राय लेनी चाहिये ? नही । लेकिन अन्ना के टेस्ट करने के लिये ली, देखते हैं ये लोग कहां कहां छेद कर सकते हैं । अन्नाने देख लिया । अब उसे सुनने की जरूरत नही । (((( आखिर लोकपाल के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों ? क्या ये इनकम टेक्स के केस की तरह कोई टाइम बारिंग केश हे , जो हर हाल में एक इनकम टेक्स अधिकारी को मार्च तक निपटाना ही पड़ेगा / क्या अन्ना टीम ने किसी से कोई वादा किया हे तो फॉरवर्ड ट्रेडिंग की तरह हर हाल में सोडा काटना पड़ेगा या फिर कोई एक समय सीमा तय कर दी हे / अरे भई इस सेशन में नहीं तो आगे सही )))) आप ने टेक्स वाली बात अच्छी कही । करदाता को टाईम देना चाहिये । टाईम तो, दिया अब कितना ? झिरो टेक्ष भरना पडे इस लिए चौपडे में हिसाब की गरबडी करनी है ? अच्छा अधिकारी ये करने नही देगा । अब मंदी है, निफ्टी डूब रही है तो सौदा तो काटना पडेगाना । सट्टा सबकुछ ले जाये तो बाद में रोना ही है । ((( संसद का अधिवेशन तो हर बार आता हे / ये सेशन नहीं तो अगला सही / ))) आप तो बहुत आशावादी हो । (((आज सभी अन्ना के साथ हें और में भी अन्ना के साथ हूँ परन्तु क्या टीम अन्ना ने महगाई , भूख ,पेट्रोल की बढ़ती कीमत , बेरोजगारी , बिजली , मकान , बढ़ते टेक्स का बोझ , पानी सड़क , रेल , महंगी स्कुल फीस , महंगा इलाज, महंगी दवाई जेसी समस्याओं पर कभी बोला हे /)))) आप भी मान गये ना ये सब प्रोब्लेम की जड ये चोर लोग ही है । लेकिन हर प्रोब्लेम के लिए अन्ना को याद नही करना चाहीए, दम हो तो खूद उठाने चाहिए । सुपरमेन भी ईतने सारे काम याद नही रख सकता, करने की बात बाद में आती है । सब काम अन्ना करने लगे तो उनका मेइन काम लटक जाता है । ये आपका सवाल आप की अज्ञानता या भटकाव ही दिखाता है । या फिर आप जानबुज कर लोगों को ही भटकाना चाहते हैं । जहाँ अन्ना जी घर परिवार की जिम्मेदारी से मुक्त हें वहीँ टीम अन्ना के अन्य सदस्य भी खाने कमाने की चिंता से मुक्त हें / आम जाता तो डेली कुवां खोदती हे और पानी पीती हे / टीम अन्ना के सदस्य जहाँ गाडी , हवाई जहाज ,और न जाने क्या क्या सुविधाएं इस्तेमाल कर रहें हें वहीँ आम आदमी ऑफिस / काम पर जाने के लिए रेल गाडी की छतों पर भरी सर्दी में भी रोजगार के लिए सफ़र करने को तेयार हे / बडे काम पैदल चलते या रेल से लटकते नही किया जा सकता । इर्शाभाव छोडिये । आप रेल से लटकते हो सिर्फ अपनी फेमिली के लिये । आप ने लास्ट मे सब बातें कही वो ठीक पर पहले भारत को नेशन तो बनने दो, फीर कहो । भारत अभी नेशन नही बन पाया है और न लोकशाही अभी आई है ।

के द्वारा: bharodiya

के द्वारा: Santosh Kumar

कोई भी जन आन्दोलन अकेले नहीं लड़ा जा सकता उसे जितना जनता का समर्थन प्राप्त होगा उतना ही वह अपनी विश्वसनीयता पर खरा उतरेगा. यही काम अन्ना ने किया सबको सत्यता का भास् कराया और अपने आन्दोलन से जोड़ा. सत्य कि लड़ाई के लिए वह बूढा व्यक्ति प्राण प्रण से समर्पित है. यदि वह यह बात पूरी ताकत से कहता है कि आज ही मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून तैयार करो तो क्या गलत है, क्यों इसे धमकी का नाम दे कर बहका रहे हो? धमकी किसी गलत कार्य को कराने के लिए दी जाती है.सही काम के लिए डाला गया दबाव आक्रोश कहलाता है और आज भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता आक्रोशित है. अशोकजी, नमस्कार! बिलकुल ही सधे शब्दों में आपका आलेख आज के सन्दर्भ में निहायत ही आवश्यक है! आपका तर्क संगत आलेख पढ़कर अति प्रशन्नता हुई! बधाई! और आभार!

के द्वारा: jlsingh

के द्वारा: akraktale

आदरणीय श्री अशोक जी, हमें इस बात का ध्यान नहीं रहा कि भारत के मौलिक अधिकार से उपाधियों का अन्त किया गया और हम फिर से उपाधियों में उलझते जा रहे हैं। वैसे भी किसी जिन्दा इंसान को कोई पुरस्कार देना खतरे से खाली नहीं होता, क्योंकि कौन-कब रास्ते से फिसल जाय.. कहा नहीं जा सकता है...संभव है कि आने वाले दिनों में भारत रत्न किसी ऐसे को भी मिल जाय, जिससे पूर्व में पाये लोगों को सम्मान में अपमान दिखने लगे। क्या कोई रास्ते से भटकेगा तो उसका सम्मान वापस लेकर भारत के सम्मान को बढ़ाने में मददगार साबित होंगे या भारत के सम्मान में बट्टा लगाएंगे..हम नहीं कहते कि अच्छा कार्य करने वालों को महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए पर किसी को भगवान बनाने की कोशिश अच्छी नहीं कही जा सकती है....क्या हमने मानवता के क्षेत्र में काम करने वालों को सम्मानित कर दिया है....ऐसा नहीं है तो उनके प्रति उदासीनता ठीक नहीं है....वैसे मानवता के लिए संघर्ष करने वालों को किसी पुरस्कार की जरूरत नहीं होती है, बल्कि वे खुद उससे बचते हैं...और उनके आगे संसार का कोई भी पुरस्कार बौना होता है...चूकि भारत रत्न का सवाल है तो इसे कसौटी पर खरा उतारा जाना चाहिए....

के द्वारा: pramod chaubey

आदरणीय श्री अशोक जी, हमें इस बात का ध्यान नहीं रहा कि भारत के मौलिक अधिकार से उपाधियों का अन्त किया गया और हम फिर से उपाधियों में उलझते जा रहे हैं। वैसे भी किसी जिन्दा इंसान को कोई पुरस्कार देना खतरे से खाली नहीं होता, क्योंकि कौन-कब रास्ते से फिसल जाय.. कहा नहीं जा सकता है...संभव है कि आने वाले दिनों में भारत रत्न किसी ऐसे को भी मिल जाय, जिससे पूर्व में पाये लोगों को सम्मान में अपमान दिखने लगे। क्या कोई रास्ते से भटकेगा तो उसका सम्मान वापस लेकर भारत के सम्मान को बढ़ाने में मददगार साबित होंगे या भारत के सम्मान में बट्टा लगाएंगे..हम नहीं कहते कि अच्छा कार्य करने वालों को महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए पर किसी को भगवान बनाने की कोशिश अच्छी नहीं कही जा सकती है....क्या हमने मानवता के क्षेत्र में काम करने वालों को सम्मानित कर दिया है....ऐसा नहीं है तो उनके प्रति उदासीनता ठीक नहीं है....वैसे मानवता के लिए संघर्ष करने वालों को किसी पुरस्कार की जरूरत नहीं होती है, बल्कि वे खुद उससे बचते हैं...और उनके आगे संसार का कोई भी पुरस्कार बौना होता है...चूकि भारत रत्न का सवाल है तो इसे कसौटी पर खरा उतारा जाना चाहिए....  

के द्वारा: pramod chaubey

अशोकभाई नमस्कार पुरस्कार के बहुत से प्रकार और लेवल है । सब राजाओं के साथ जुडे हैं । (१) आप रास्ते पर भिखारी को आठ आना दान करते उस समय आप राजा हो । ये दयाभाव और अपनी छाति फुलानेवाला पुरस्कार है । (२) एक राजा । रानी को बच्चा आता है । दासी दौडती हुई आई और बधाई दी । राजाने नौलखा हार अपनी गरदन से निकाल के दे दिया । आज उस की किमत १० करोड से ज्यादा हो सकती है । ये खूशी का वाला है, नौकरानीने कोइ बडा काम नही किया था । (३) रामन या सरदार को देना पड जाए वो मजबूरी वाला है , दुनिया की शरम से दे ना पडता है । (४) कलाकार या खिलाडी --ये वोट बेंकवाला प्रकार है । वो जानते हैं सचीन के करोडों फॅन है । उसे खूश कर अपना बनाओ, गुलाम बनाओ । फेन क्लब अपने आप सरेंडर होगा । (५) नफरत वाला प्रकार -- किसी को न मिला है न मिलेगा । लेकिन ये प्रकार है जरूर । अमिताभ को देखो । अन्ना भी ईस के हक्क्दार है ।

के द्वारा: bharodiya

भरोडिया भाई नमस्कार, बहुत दिनों बाद आप लौटे हैं किसी ब्लॉग की प्रतिक्रया पर पढ़ा था मैंने की आप गाँव गए थे, मगर ये क्या? आते ही आपने ये क्या कर डाला, चलो मध्यांतर के ख़त्म हो रहा है हुआ नहीं है चलता है विशेष परिस्थितियों में कुछ भी हो सकता है क्या करें परिस्थितियाँ ही ऐसी हैं. मै कल रात ही सफ़र से लौटा था मगर थकान की वजह से अधिक देर नहीं दे सका मंच को.अब सबेरे मै फिर तारो ताजा हूँ. और यही सारी जनता से भी उम्मीद करता हूँ की हम जिस युद्ध को मध्यांतर से पहले छोड़ गए थे अब उसे पुनः आगे बढाने की आवश्यकता है तनिक भी भ्रमित ना हों और एकजुट हो कर फिर लड़ें तभी हम कुछ हद तक भ्रष्टाचार को कम करने में कामयाब हो सकें वरना तो ...... आपने अपनी भावनाओं को प्रदर्शित कर ही दिया है अब पुनः जैसी तो कोई बात नहीं है बस संयम के साथ अन्ना का साथ दे कर हम अपने आने वाली पीढ़ी का कुछ भला कर सकें तो यही कामयाबी होगी.धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

माताएं क्यूँ पछताती हैं, बेटे को सरदार बनाकर. ये अदनी सी तलवार बताकर हम को बस फुसला सकते हैं आग जो दिल में लगी हुयी है क्या उसको ये बुझा सकते हैं बड़ी कहानी किस्सा देखा अब आया है मध्यांतर आओ जोश भरे वीरों हम अपना इन्हें दिखा दें दम हम चाहें तो काट डालते फौलादी चट्टानें आसमान को उड़ थर्रा दें सागर छाती चीरें इन को बोलो हम को समझें फूल बिछाएं राह नहीं तो हाथ मले ये बैठें अबकी काम तमाम !! प्रिय अशोक भाई बहुत सुन्दर ..निम्न पंक्तियाँ आप की बड़ी प्यारी सीख देती और हमें भी जोश दिला गयीं .... भ्रमर ५ पहले भी तो खूब लड़े हो, आगे भी है बहुत लड़ाई, मंजिल तुमको पाना है तो, यह अन्धकार मिटाना है तो, आओ बढे सब फिर मिलजुल कर, ख़त्म हो रहा अब मध्यांतर.

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

मान्यवर, सादर. ललकारती और जोश भरती रचना की बधाई. विराम समाप्त, यात्रा प्रारंभ. आह्वान........आपका....हमारा......सबका.......!! . ख़त्म हो गया मध्यांतर, अब पुनः लड़ाई जारी होगी, बहुत दुशासन कंस गए, अबकी तो इनकी बारी होगी. देशद्रोहियों पीठ दिखाओ, आँचल में जा छिपो भागकर, हहर-हहर हुंकार किये जनता आती है नींद त्याग कर. . मातृभूमि करती पुकार, युवकों जागो तन्द्रा त्यागो, जो मूलभूत अधिकार मिले हैं, उनको तुम हक़ से मांगो. दें अगर नहीं तो उठो छीन लो ताल ठोककर ललकारो, क्या भूल गए ताकत अपनी, इन दुष्टों को अब संहारो. . नवज्योति उतारो भारत में, खिल उठे धरा और आसमान, पशु-पक्षी करें कलरव निर्भय, वन-पर्वत हो गुंजायमान. . मंजिल पाने और अन्धकार मिटाने के लिए यह मशाल जलाए रखनी है. एक जोशीली रचना के लिए पुनः बधाई.

के द्वारा: shashibhushan1959

के द्वारा: akraktale

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

नमस्कार, raktale जी, इस गेम शो की जितनी खूबियाँ आपने गिनाई हैं अच्छी हैं मैं भी इस शो का सिर्फ इसलिए ही प्रशंशक हूँ क्योंकि अमित जी जिस प्रकार से शो को प्रस्तुत करते हैं, उन्हें देख सुनकर बहुत कुछ सीखने को मिलता है , और इस बार जरुरतमंदों को इस शो का हिस्सा बनाकर एक तरह से शो आयोजकों ने बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है ! वैसे सर आपका लेख तो बहुत उत्तम है किन्तु आप इस लेख मैं काफी बड़ी गलती कर गए, वैसे मैं ये गलती आपको बता देता किन्तु ये लेख एक गेम शो पर है इसलिए चलिए मैं आपको मौका देता हूँ अपनी गलती सुधारने का, इसलिए आप फिर से अपना लेख पढ़िए गलती ढूंढिए और नहीं ढूंढ पायें तो मैं आपको बता दूंगा , आपका समय शुरू होता है अब ....

के द्वारा: allrounder

के द्वारा: akraktale

प्रिय अशोक जी अभिवादन बहुत ही सार्थक और बेबाक लेख ..कुछ की आँखें खुलनी ही चाहिए इस से ..ये राज नीति न जाने कौन सी राज नीति है लोग इस गन्दी नीति बना डाल रहे हैं नेताओं को बनाया गया था की वे हमारी जनता की मदद करें और बिउरोक्रेसी से बचाएं लेकिन हो सब उल्टा रहा किस पर करें भरोसा ?? सुन्दर ..भ्रमर ५ कम समय में अधिक शोहरत पाने के उद्देश्य से इन्होने भी उसी घ्रणित तरीके को अपनाया. उत्तर भारत के गरीब लोगों के साथ मारपीट की जब इनको उत्तर भारतीयों से नफरत थी तो क्यों नहीं इन्होने उद्योग धंधे में लगे और फ़िल्मी दुनिया के मशहूर नामो से मारपीट की क्यों नहीं उन्हें मुंबई छोड़ने के लिए कहा? यही राजनीति है.

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

अक्रतालेजी, अत्यंत संतुलित (balanced ) लेख. इतना अच्छा विश्लेषण की दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया,खासकर अंतिम पैर में जो आपने संस्कृति धूमिल होने की बात कही वो इतनी सही है कि ना केवल मुबई बल्कि देश के अन्य भागों में भी रहने वाले दुसरे प्रान्तों के लोगों पर भी लागु होती है. मसलन नार्थ ईस्ट के लोग भी मारवाड़ियों एवं अन्य उत्तर भारतियों को अपनी संस्कृति से सर्वथा जुदा हो कर निवास करने कि बात को हेय नज़रों से देखते हैं. आप जहाँ लम्बे समय से रहते है तो आपको वहां कि सांस्कृतिक परम्पराओं का भी आदर करना होगा और अपने परिवार में भी उस संस्कृति को स्थान देना चाहिए, जो अक्सर नहीं हो पाता और स्थानीय लोग उन्हें "पराये" ही समझते हैं जो कुछ हद तक स्वाभाविक भी है. बाकी तो जैसा आपने लिखा अवसरवादी राजनीति हर बात का फायदा उठाने को तत्पर rahti है , चाहे इसके लिए भाई-भाई को भिड़ाना ही क्यों न पड़े. एक अत्यंत विचारशील लेख के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: omprakash pareek

आदरणीय अशोक जी ..... नमस्कार ! नमस्कार + शुक्रिया + आदाब + आदर सहित स्वागत +अभिनन्दन और आभार ! राज ठाकरे का खुद का लड़का इंग्लिश स्कुल में पड़ता है और उसको मराठी भाषा भी शायद नहीं आती – मुंबई की आग से दूर वोह बेचारा आने कल का नेता विदेश में सुरक्षित होकर रह रहा है ...... इसे कहते है चिराग तले अँधेरा –पर उपदेश कुचल बहुतेरे –लेकिन जनता भोली और नादान है वोह अन्ध भक्ति में इन सब बातो को नहीं देखती है ...... कौर्ट और सरकार भी तब एक्शन लेंगे जब यह और इनकी विचारधारा +तथा समर्थन कमजोर पड़ जायेंगे ...... आपका मुबार्कबाद सहित आभार न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: rajkamal

अशोकभाई नमस्कार आपने ठिक ही कहा कोई भी सरकार आये क्या कर लेगी. प्रधानमंत्री खूद कह रहे हैं किमतें सब बाजार के आधार से चलेगी । जीना है तो बाजार भाव से खाना खरिदो, गाडीमें घुमना है तो बाजार भाव से गाडी और पतरोल खरिदो, पढना है तो भी, बीमार हो तो भी और मरना है तो भी भाजार भाव से जहर और लकडी खरिदो । लोग फालतु में कुछ स्त्रीयो को बाजारू केह देते हैं । असल में पूरा देश ही बाजारू है । समाचार बाजारू, सत्ता बाजारू, न्याय बाजारू, आदमी के संबंध भी बाजारू होते जा रहे हैं । धनी है तो संबंध रख्खो गरीब है तो तोड दो । बाजारू है पर जीवन है ईसे जीना तो पडेगा । पत्निया रास्ता दिखाती है, कभी कभी अच्छा होता है वो रास्ता ।

के द्वारा: bharodiya

के द्वारा: nishamittal

प्रिय अशोक जी अभिवादन आप को नहीं भाभी जी को देखिये न कितनी जागरूक है हमारी नारी समाज जब उन्हें इतना कुछ समझ में आता है तो सरकार के साथ क्या कुछ दिमाग वाले हैं ही नहीं ...बहुत सुन्दर संजीदा बातें भाभी की व् ऐसे मंहगाई से पिसते सभी के ...सुन्दर देखो जी अब ये सपने देखना छोड़ दो. अभी सरकार को दो वर्ष बाकी हैं.दो वर्षों में पेट्रोल के भाव भी दो सौ रुपये लीटर हो जायेंगे. तब फिर हमसे ना कहना की सायकिल पर चलकर बाजार हो आते हैं.अब तो हम सायकिल पर बैठना भी भूल गए हैं और तुम्ही कौन सायकिल चला पाओगे.”अब कुछ हंसते हुए श्रीमती जी बोलीं. मैंने भी कुछ मजाकिया लहजे में कह दिया “चलो ठीक है सोमवार के उपवास के साथ ही गुरूवार और शनिवार का उपवास और कर लेंगे आभार और अभिवादन आप को भी भ्रमर ५

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

आदर्णीय अशोक जी .....सादर अभिवादन ! कुछेक राजकमलिया तरीके अपनाए :- *टमाटर +प्याज और हरी मिर्च को बहुत ही बारीक़ काट कर उस में नमक मसाला मिला कर एकाध रोटी कभी -२ खाकर देखा करे .... *सब्जी का सिर्फ भुना हुआ मसाला ही (कम नमक वाला ) रोटी के साथ खाकर देखे -एक अलग ही स्वाद मिलेगा .... *कभी -२ आलू के साथ सोयाबीन और बेसन के पकोड़े अलग -२ या फिर इकट्ठे ही मिला कर ट्राई करे .... *एक दो रोटी मलाई में नमक मिर्च या फिर चीनी मिला कर भी खा सकते है ..... बाकी के नुस्खे मेरी शादी के बाद .... हा हा हा हा हा हा मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/05/“भ्राता-राजकमल-की-शादी”/

के द्वारा: Rajkamal Sharma

अशोकभाई नमस्ते मुझे ईस त्योहार को लेकर सिर्फ दो प्रदेश में ईसे कैसे मनाया जाता है उसकी जानकारी थी,गुजरात और बंगाल । उसमें मुझे बहुत विरोधाभास लगता था । आपने और जानकारी दे दी विरोधाभास भी बढ गया । सब जगह ईसे पॉजिटिव लिया गया है, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से ईसे नॅगेटिव लेते हैं । इन प्रदेशों मे ये डर का त्योहार है, अशुभ त्योहार है । बच्चा अगर ईस दिन पैदा होता है तो उसे जीवनभर ताने सुनने पडते हैं -- ये चौदसिया है या काली चौदश की पैदाईश है ।---- कुछ साल पहले धनतेरस व्यवसायियो का मार्च ऍन्डिंग होता था । सी.ए तो थे नही भगवान को ही सी.ए. समज कर अपनी हिसाबी किताबें उन के चरणो मे रख देते थे । पूजा करते थे, प्रभु, कर दो हमारा ऑडिट । दूसरा दिन याने चौदश उन लोगों के लिये डर और चिंता का दिन है, भगवानने ऑडिट पास किया या नही, हिसाब में क्या क्या भूल निकाली होगी । ये बात जोक थी नीचे की बात जोक नही है । ईस प्रदेश में अघोरी साधु और तांत्रिक के लिये ही ईस दिन का महत्व है । वो लोग रात में स्मशान में जाकर तान्त्रिक विधी करते हैं । भुतों के राजा को बुला के अपनी विद्या को चार्ज करते हैं । आम आदमी में किस की मजाल है जो ईस दिन से ना डरे । स्त्रीयां थोडी हिम्मत बताती है । चने के आटे से गोल गोल खाने के वडे बनाती है, थाली में ले के पूरे घर में घुमती है घर में कोइ बला छुपी हो तो उसे वडे खाने को बुलाती है और बाहर जा के चौराहे के बीच वडे रख देती है, पानी की गोल लक्षमण रेखा भी कर देती है ताकी बला घर में वापस ना आ जाये । रास्ते पर जानेवाला भी सावधान हो जाता है । लक्षमणरेखा में पैर नही पडने देता है, दुसरों के घर की बला अपने घर क्यों ले जाए । सब विधी के बाद घर के लोगों को वडे खाने को मिलता है । बंगाल मे तो दुर्गापूजा बहुत भव्यता के साथ मनाया जाता है । उस मे चौदश का बडा महत्व है । होली, दिवाली की तरह राष्ट्रिय त्योहार नही बन पाया है, क्षेत्रिय त्योहार ही है ।

के द्वारा: bharodiya

राजकमल जी भाई साहब सादर नमस्कार, मेरे इस जानकारी देने के पीछे मकसद सिर्फ इतना था की पग पग बदलती संस्कृति वाले महान देश हिन्दुस्तान में हम अपने प्रान्त के तीज त्यौहार मनाने के तरीके से दूसरों को भी अवगत कराएं. और दूसरा ये की पांच दिवसीय त्यौहार में धन त्रयोदशी,दीपावली और भाई दूज के बीच आने वाले त्योहारों को हम भूल ना जाएँ.कारण के लिए आप की आज्ञा से मै एक जोक सुनाना चाहता हूँ. एक बार परीक्षा में पांच पांडवों के नाम लिखने का प्रश्न आया. जब बालक लिख नहीं पाया तो शाम को सरदार जी नाराज हुए बोले तुझे पांडवों के नाम याद नहीं हैं सुन मै बताता हूँ. एक सी भीम और एक सी अर्जुन, दो भाई और सी और एक दा नाम मेनू याद नी है. आपसे तीज त्यौहार की जानकारी भले ना मिली हो मगर स्वमंथन की अमूल्य जानकारी आप ही से मिलती है. धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

के द्वारा: minujha

के द्वारा: rahul

आदरणीय परिक जी, आपकी ही तरह मै और मै ही क्या सारा देश अन्ना के साथ ही है किन्तु जब हम पूर्णरूप से भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं तो फिर इन सभी बातों को पकड़ कर ही चलना होगा, वरना आप प्रशांत भूषण जी के बयान का उदहारण देख ही रहे हैं.हमें सदैव टीम अन्ना को यह याद दिलाते ही रहना होगा की हमारा मकसद देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना है. आपका कहना सही है की भ्रष्टाचार का दूसरा नाम ही कांग्रेस है.अवश्य ही हम बहुत सी बातें नहीं जानते मगर जो जानते हैं वह भी क्या कम है? कालेधन पर जब जबरदस्त आवाजें बुलंद होने लगी तो कांग्रेस अध्यक्षा का कई बहानों से बार बार देश से भागकर जाना क्या था? आपकी ही तरह मै भी अन्ना समर्थक हूँ मगर मै आँख बंद करके अन्ना का समर्थन नहीं कर सकता शायद यह मेरी बुराई है. धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

अक्रतालेजी, आपकी सारी बातें अपनी जगह सही है लेकिन यहाँ कुछ पेच हैं जिन पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा. सीधे-सीधे कांग्रेस पर वार एक तरह से सीधे सीधे भ्रष्टाचार पर ही वार है. देशवासियों की स्मरण शक्ति जरा कमजोर है वरना यह बात बिलकुल दीगर है की ठेकों में भ्रष्टाचार की संस्कृति का सूत्रपात कांग्रेस ने ही किया, जो बाद में इसी कांग्रेस राज में फला फूला और आज तक जारी है. साथ के दशक में पंडित नेहरु ने पुनजब के मुख्यमंत्री कैरों और उसके बेटे सुरेंदेर्सिंह के भ्रष्टाचार को सहर्ष समर्थन दिया. 1962 की भारत चीन लड़ाई में कृष्ण मनों जो नेहरूजी के अन्तरंग मित्र थे; तथाकथित "जीप स्केंडल" में फंसे. देश की हार हुयी थी हजारों जवान मरे जिसका कारन वो रक्षा ठेके थे जिन में खुल कर बेईमानी बुई थी. क्या क्या गिनाऊं ऐसे सैंकड़ों उदाहरण दे सकता हूँ. हजारों कैग रिपोर्टें कांग्रेस सर्कार ने ठन्डे बसते में डाल राखी हैं. आप चाहें तो आर. टी. आई . में इन्हें खुलवा सकते हैं. यह तो देश का दुर्भाग्य है की आज तक इन सब स्केंदलों पर कोई रिसर्च नहीं हुयी, वरना देशवासियों की आँखें खुली की खुली रह जाती. इतना अधिक लूटा गया की जिसका परिणाम आम आदमीं की भुखमरी और गरीबी बना हुआ है. आपका कहना सही है की हिसार के अन्य दोनों उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि में भी उनका खानदानी भ्रष्टाचार है परन्तु जनता क्या करे कोई कायदे का विकल्प भी तो नहीं है. आपने लिखा की अगर कांग्रेस विरोध ही करना था तो रामलीला मैदान से करते पर आप सोचिये सारे काम एक झटके में नहीं होते ; परिश्थितियों को देख कर होते हैं. लोग अन्ना से जाने क्या-क्या चाहते हैं पर उन्हें एक काम तो करने दीजिये, आखिर वे इंसान हैं और उन्हों ने राष्ट्र रक्षा हेतु एक बड़ा संकल्प उठाया है. महाराष्ट्र का वो बूढा शेर जिसका ज़िक्र आपने किया वो आखिरकार एक राजनीतिग्य है जो चुनाव लड़ता है. उसकी एक पार्टी है जो सत्ता में रही है और आगे भी सत्ता के सपने देखती है. सो उनकी तुलना अन्नाजी से करना ठीक नहीं. अन्ना एक राष्रीय व्यक्तित्व बंचुके हैं किसी प्रान्त विशेष के नहीं. मेरा मन है है की वे हमें मझधार में नहीं छोड़ेंगें, हिस्सार में वे जो कुछ कर रहे हैं वो राजनीती नहीं बल्कि एक बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति है. सभी को अन्ना का साथ देना है.

के द्वारा: omprakash pareek

आदरणीय अशोक जी,  सादर प्रणाम  आपके लेख को बार-बार पढ़ने पर अन्ना जैसे मानुष के बारे में विचार करने हेतु बाध्य कर दिया कि क्या वास्तव में अन्ना टीम का फैसला वाजिब था या नहीं। नाग नाथ और सांप नाथ में जनता  को चूनना है। मुझे भी लगता है कि हिसार में कांग्रेस का विरोध कर  अन्ना की टीम ने बहुत अच्छा नहीं किया है।बुरा, अच्छा, बहुत अच्छा  में विकल्प ढूढूने की गुंजाइज का बनना ही उपयुक्त नहीं कहा जा सकता है।  वैसे परिस्थियां किस तरह की थी, उसके बारे में मुझे बहुत पता नहीं है।  जन लोक पाल के समर्थन में देश खड़ा था। ऊंचाई पर पहुंचने के बाद  उस पर टिके रहना आसान काम नहीं है। कलुषित कथित नेताओं पर  रोक लगाने का बेहतर उपाय विकल्प बनाने या विकल्प बनने पर विचार  करने की जरूरत है। पथिक को रास्ते में कई रोड़े मिलेंगे।  भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में अभी भी अन्ना टीम  को जनता का कथित आशीर्वाद प्राप्त है  पर उसे वोट के रूप में आंकना भूल हो सकती है। हो सकता है कि अन्ना टीम को लगा हो कि हम अपना प्रत्याशी नहीं जिता सकते परन्तु केंद्र की हुकूमत के प्रत्याशी को  हरा सकते हैं। पहले हराएगें, फिर हारेंगे और बाद में जीतेंगे कि नीति हो सकती है।  अन्ना जी और उनकी टीम से अब भी जनता को बहुत उम्मीद है। इस पर सार्थक प्रतिक्रया देने में मुझ जैसे व्यक्ति को और कुछ समय लग सकते हैं। फिर...

के द्वारा: pramod chaubey

अशोकभाई नमस्कार एक बार चाणक्यने सिकंदर के विद्वान मित्र से कहा की जब जब धर्म की हानि होती है, तो देवता नाराज होते हैं । फिर देवता प्रजा को पीडा देते हैं । राजा और प्रजा अज्ञानी होते हैं । हम विद्वानों का फर्ज है अधर्म को रोकें । प्रजा के हित मे अगर राजा बाधा है तो उसे हटाना हमारा कर्तव्य है । सिकंदर के मित्रने सिकंदर को जहर दे दिया ईतिहास गवाह है । आज हमारी पिडा ये है की हमारे पास चाणक्य नही है । सिकंदर का मित्र है जो सिकंदर को जहर देने की कोशीश कर रहा है । अशोकभाई किसी भी राज्यमें, किसी भी पक्ष मे अच्छा नेता नही होता है ऐसा नही है । अच्छे नेता भी होंगे । बस, उन के आलाकमान जनता के सामने पेश नही करते, खराब नेता को ही जनता के सामने रखते है और मजाक करते हैं की लो, ईसे वोट दे के चुन लो । ये एक दूसरा और बडा मुद्दा है । सब का निपटारा एक साथ नही हो सकता, अन्ना भी समज गये हैं, ईस लिये चुनाव सुधार का मुद्दा अभी साईड पर चला गया है । अन्ना कभी भी अपना आदमी खडा करके आलाकमान बनना पसंद नही करेंगे । जब द्विस्थरिय चुनाव सिस्टम आयेगी तब पेह्ले चरण में जनता ही नेता को टिकट देगी और बादमे दुसरे चरण मे उसे चुनेगी । लेकिन ये सपने से पेहले का सपना लोकपाल हैं । उसे पूरा करना प्राथमिकता है । कोंग्रेस ही बाधा डालती है तो उसका विरोध जरूरी है, बीच मे और भ्रष्ट तत्व मजे ले ले तो अन्ना लाचार है । अन्ना को दोष नही दे सकते । काले चोर को भी वोट दो, कोंग्रेस को मत दो । काले चोर से तो निपट लेंगे लोकपाल के बाद । लेखक कोशीश तो कर सकता है, चाण्क्य की झोंपडी के दरवाजे के पास खडा रेहने की ।

के द्वारा: bharodiya

आदरणीय अशोक भाई जी ,.सादर नमस्कार आपसे सहमत हूँ ,...,..उनके इस निर्णय को जल्दबाजी में लिया गया और अपरिपक्व मानता हूँ ,..भले ही बीजेपी ने उनसे लिखित वादा किया हो लेकिन इस कुटिल कलुषित राजनीति में "वादे हैं --वादों का क्या " ... केजरीवाल साहब कहते हैं ,..हम और क्या कर सकते थे ?...तो हिसार से क्या एक ईमानदार, क्षमतावान व्यक्ति नहीं मिला ,..यदि नहीं मिला तो आपको आन्दोलन बंद कर देना चाहिए ,..फिर तो हमें यही मानना होगा कि हम इसी राक्षस राज के हकदार हैं ,...यदि लड़ने कि हिम्मत नहीं हुई तो अपने अन्दर झांककर देखते .....मेरे मत से कुछ और इंतज़ार करना सबसे ज्यादा अच्छा होता , कांग्रेस हिसार से तो वैसे भी कमजोर है ,....इस जीत में भी हार है ,.मुझे भरोदिया भाई जी कि बात अच्छी लगी ,.जो होगया ,जो होरहा है ,जो होगा ..अच्छा ही होगा ,इसी सकारात्मक मानसिकता के साथ ,..आपका हार्दिक आभार

के द्वारा: Santosh Kumar

आदरणीय प्रमोद जी नमस्कार, भाईसाहब अब मुझे तो इस बात का सिरा भी नहीं दिख रहा और अंत तो शायद है है नहीं.इसलिए मै चाहूंगा की इस अंतिम प्र्तुत्तर के पश्चात भी आपके मन में कई बातें जानने की रह ही जायेंगी. मै और आप जब कभी मिलेंगे तो फिर हम उस पर और भी चर्चा कर सकेंगे. बांछड़ा समाज के बारे में भी मै संक्षिप्त किन्तु अंतिम जानकारी विशेष आपकी जानकारी के लिए ही लिख रहा हूँ. इस समाज में पुरुष कोई कार्य नहीं करता हाँ मजबूरी के कारण चोरी डकैती जैसे अपराधों में इनका लिप्त होना पाया गया है. इनके यहाँ प्रथा है की ये अपनी ही पुत्री या यों कहें की घर की सभी महिला सदस्यों को इस गलत कार्य में सम्मिलित रखते हैं. इनके समाज का विस्तार राजस्थान से लगे हुए मध्य प्रदेश की तरफ है. इनके यहाँ पुत्री होने पर खुशियाँ मनाई जाती हैं.शायद पुत्र की ह्त्या भी कर दी जाती हो. इनके कोई अलग से वैश्यालय नहीं है ये लोग परिवार के साथ ही रहते हैं.वहीँ पर इनका अनैतिक कार्य भी चलता रहता है.सड़क किनारे बसे होने से सर्वाधिक इनके यहाँ जाने वालों में ट्रक ड्राईवर अधिक होते हैं. प्रदेश शासन द्वारा इनकी सुध ले कर इनका पुनर्स्थापन का प्रयास भी किया गया किन्तु उसके नतीजे कोई बहुत प्रभावशाली नहीं हैं. हाँ कुछ परिवार अवश्य ही वहां से अलग हो गए किन्तु शासन ने इनकी कोई इतनी बड़ी मदद नहीं की जो की ये लोग पुरे मन से इस काम को छोड़ देते. ऐसा कोई उदाहरण देखने में नहीं आया की इनके यहाँ से छुड़ाई गयी कन्या किसी ऐसे माँ बाप की संतान हो जो की कन्या नहीं चाहते अधिकांश गरीबी ही होना प्रकाश में आया है.हाँ ये जरूर हो सकता है की आस्पताल से चोरी हुए बच्चे इनके यहाँ तक भी पहुंचे हों, मगर इसका कोई प्रमाण अभी तक नहीं है. आपका फिर आभार आपने रूचि ली आगे हम जब भी मिलेंगे या फिर कोई अवसर होगा तो मेरे पास उपलब्ध जानकारी से आपको अवश्य ही अवगत कराउंगा. धन्यवाद. इति.

के द्वारा: akraktale

आदरणीया निशा मित्तल जी,आदरणीय श्री अशोक जी आप दोनो को नमन। मुझ ना समझ की बात निशा जी को स्पष्ट नहीं हो सकी।  इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं। संबंधित विषय को हम जितनी बार बोलेंगे, मुझे लगता है।  खुद को अपराध बोध होता है, क्योंकि समाज में खामियों के लिए हम कम जिम्मेदार  नहीं हैं.... “बांछड़ा समुदाय” को संचालित करने वाले तथाकथित प्रमुख  और ऐसे धन्धें को चलाने वाले लोगों से आपको खतरा हो सकता है। आप पर मुझे किसी प्रकार का कोई शक नहीं है। न तो मैंने अपनी  बात में कहीं आप पर शक जाहिर किया है। (महज हंसने के लिए)आपने  शक की बात कर शक पैदा कर दिया है। भगवान भूतभावन से आशीर्वाद  चाहता हूं कि अधर्म की लड़ाई में पूरा साथ निभा सकूं। मुझे उम्मीद थी कि  धर्म के नाम पर कोई अधर्म जैसी कोई बात है, जिसके चलते कुरीति चली  आ रही है। अब इस कुरीति में गरीबी मददगार साबित हो रही है। आंख पर  पट्टी बांधकर समस्या के निदान की कोशिश में जुटे हमारे जैसे इंसान को  एक रास्ता मिला। एक निवेदन है कि आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि  कहीं कथित सभ्य समाज जो  भ्रूण (कन्याओं) हत्या का विरोधी है ऐसी  गन्दी कुरीति के पीछे परदे के रूप में खड़ा तो नहीं है। कन्याएं देवियां है। इनके बिना सृष्टि या उसका विस्तार संभव नहीं है। जिन लोगों ने कन्याओं  की उपेक्षा की है उनके परिवार का मुखिया पुरूष नहीं होना चाहिए। इसके  अपवाद भी हैं। जो इन्हें बेचकर पैसे कमाने की सोच रखता है, वहीं असूर है,  राक्षस है....जहां से समस्या प्रारंभ हो रही है, उसे रोकने के लिए सतत प्रयास  की जरूरत है। माननीय न्यायापिलका तो हमारी व्यस्थापिका द्वारा बनाये कानूनों  को कार्यपालिका द्वारा पालन नहीं होने पर दण्ड दे सकती है। पहले राष्ट्रीय स्तर पर “बांछड़ा समुदाय” की रीतियों और कुरीतियों का व्यापक अध्ययन किये जाने की  जरूरत है और मुझे लगता है कि  “बांछड़ा समुदाय” पर जरूर शोध कार्य हुए होंगे।  उनमें इन बातों का उल्लेख होना चाहिए। मेरे जैसा नासमझ इंसान पूरे देशवासियों  से अपेक्षा करता है कि वासना को ढाल बनाकर चल रहे ऐसे कार्यो पर स्थाई तौर  पर रोक लगाने की श्री अशोक जी के बातों पर गंभीरता से विचार किया जाय और इसे अनिवार्य दायित्व माना जाय। मेरा संकल्प है कि मुझसे जो कुछ बन पड़ेगा, इसके  लिए करूंगा। ऐसी कुरीतियों को सामने लाने के लिए श्री अशोक  जी को कोटिश धन्यवाद। संबंधित मामले पर अब भी मेरे मन में विचार मंथन है।   

के द्वारा: pramod chaubey

आदरणीय प्रमोदजी नमस्कार, आपने अवश्य ही काफी जागरूकता का परिचय दिया है.आपकी बातो में शुरू में जो आपने लिखा है शायद मै ठीक से समझ नहीं पाया हूँ. मगर मुझे लगता है शायद आप मुझ पर कुछ शक कर रहे हैं. यदि ऐसा है तो मै समझूंगा की किसी को न्याय दिलाने के चक्कर में मै हाथ जला बैठा हूँ. मेरा इन स्थानों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है जो भी है सामाजिक ही है.उज्जैन मेरा जन्म स्थान है और इस केंद्र से कम से कम २५० किलोमीटर की परिधि मेरा कार्य क्षेत्र है. वर्ष में लगभग चार पांच बार मेरा कार्य से नीमच की तरफ जाना होता है. मेरे परिवार से जितनी दूर तक मै याद कर सकता हूँ कोई भी पुलिसवाला नहीं हुआ,मगर दुःख की कोई सेना में भी नहीं गया. मैंने है एक बार सेना में जाना चाहा था किन्तु सफल नहीं हो सका. आप अवश्य ही भ्रमण करें. उज्जैन मै भूतभावन राजाधिराज महाकालेश्वर के दर्शन करें और जब मंदसौर जाएँ तो भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करें, नीमच के नजदीक भादवा माता के दर्शन और वहां के सल्फरयुक्त जल वाले कुँए के जल से स्नान करने से दूर होने वाले चरम रोगों का भी आवश्यकता अनुसार लाभ लें. बलि तो अब मात्र मांस भक्षण का बहाना है. अब फिर विषय पर आते हुए मै आपको बताना चाहता हूँ की इस पेशे में लिप्त लोग लोग इसे पारिवारिक पेशा ही बताते है और इनके समुदाय का नाम "बांछड़ा समुदाय" है. किन्तु जिस तादाद में पुलिस ने रेकोवेरी की है उससे समझने में देर नहीं लगाती की अब ये कितना पारिवारिक रह गया है. मुझे उन लोगों से जरा भी सहानुभूति नहीं है जिन्होंने अपने या किसी और के बच्चे को इस समुदाय के हाथों गरीबी,आपसी रंजिश या किसी और भी कारण से बेचा है.

के द्वारा: akraktale

आदरणीय श्री अशोक जी,  सादर प्रणाम  आप सारा अंदाजा आसानी से लगा ही लेंगे..... आपका कथन मुझे लक्षणों के  आधार पर अनुमान लगाने के लिए बाध्य कर रहा है परन्तु इलाज बिना  परीक्षण (जांच रिपोर्ट) के सटीक नहीं किया जा सकता है। ईश्वर न करे, आपको  नजर लगे पर इतना बता दूं कि आपके माध्यम से ईश्वर कुछ बड़ा कार्य कराना  चाह रहा है। इसका विरोध आपको अपने आस-पास के लोगों से उठानापड़ेगा।  विचलित नहीं होंगे। समय का ख्याल रखेंगे। बिना बताये तो आप वैसे भी नहीं  जाते परन्तु एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से पूर्व तय कर लें कि वहां जाना  आवश्यक और सुरक्षित हैं तभी जायें। समाज का कार्य और अपनी सुरक्षा दोनों  आपको खुद करनी है। इसमें ईश्वर आपकी पूरी मदद करेगा। ईश्वर से हम कामना  करते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर कुछ ऐसा हो कि जिसमें आप देश (राष्ट्रीय स्तर) के  क्षितिज पर चमकेते सितारे हों और आप सूचित करें तो मेरे जैसा तुक्ष्य इंसान  प्रफूल्लित हो।  सुरक्षित शब्द को एक बार फिर से दुहरा रहा हूं। वर्दी से कत्तई सुरक्षा  की उम्मीद मत करियेगा। आपके अपने इस महकमे में होंगे तो संभव हो कि हमारी  इन बातों से आपको दुखः पहुंचे। मेरा खुद का मानना है कि किसी इंसान को  विशेषकर पुलिस की वर्दी नसीब होती है तो मजह एक जन्म के कुकर्मों का ही  योगदान नहीं होता है। कई जन्मों के कुर्कमों के फलित होने पर किसी इंसान  को पुलिस की वर्दी नसीब होती है ताकि उसकी पीढ़ी पूरी तरह से बर्बाद हो जाय।  कुछ इसके अपवाद होते हैं। अन्य किसी को मेरी बातों को बुरा लगेगा को उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं....  जिसने मुझे बनाया, उसकी कृपा होगी तो निश्चत तौर आपके बताये गये स्थलों की मिट्टी को माथे लगाउंगा। जिस धरती(मां) पर आपने जन्म लिया है। उसे पूरे संसार में स्तुत्य होना चाहिए या नहीं है तो स्तुत्य होगा। मुझे पूरा विश्वास है। उसी मिट्टी से आपने जन्म लिया है। कुछ घटनाएं मुझे याद आ रही है। जिनका उल्लेख करना वाजिब समझता हूं.....  श्री अशोक जी आपके द्वारा उठाई गयी समस्या कोई एक  दिन नहीं है। इसलिए ऐसी समस्या का समाधान एक दिन में होने वाला  नहीं है और न ही आप ऐसी उम्मीद करियेगा। अनुमान लगाने के लिए आपने  कहा तो मुझे लगता है कि जैसे इंसान को ठण्डक लगे और बुखार आये तो मलेरिया की उम्मीद हो सकती है। कुछ अन्तराल पर बुखार भी आये तो टाइफाइड हो सकता  है। वैसे ही आप द्वारा उठायी सामाजिक समस्या पर मुझे लगता कि इसके पीछे धर्म के  नाम पर अधर्म और भूख के नाम पर गरीबी होगी। अनुमान गलत होने पर माफ करेंगे।  युद्ध तो महज अमीरी और गरीबी के बीच है। कानून इस तरह की समस्या पर शत-प्रतिशत  रोक लगाने में सफल नहीं हो सकता है। इंसान को मलेरिया से बचने के लिए नियमित  गुरूच का इस्तेमाल करना होगा। मलेरिया नहीं होगा, जिन्हें मलेरिया हुआ है। उनके खून  की जांच कराकर मलेरिया के रोकथाम के लिए बनी विविध दवाओं को लेना होगा, तभी  जान बचाई जा सकती है। सामाजिक बीमारी का निदान प्राथमिक तौर पर जांच और  निदान है, वहीं नियमित उपाय गुरूच जैसी लता से कर सकते हैं। गुरूच वेद में वर्णित  सोम के परिवार से है। हमारे प्रदेश उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के दक्षिणी छोर  पर मां जिरही देवी का स्थान है, जहां पर प्रायः हर रोज बकरों आदि की बलि दी  जाती है। संयोग से गरीबों को ख्याल में रखकर ऐसे स्वाभाविक तौर पर शक्तिपीठ  तक पहुंचा तो वहां का दृश्य देख चकित रह गया। लोगों ने बताया कि जुगैल गांव  में कोई भी शादी-विवाह के बाद बलि की प्रथा अनिवार्य है, जो ऐसा नहीं करता है,  उसे नुकसान उठाना पड़ता है। तथाकथित नेता भी अपनी जीत की खुशी में(सांसद  व विधायक) तक बकरे की बलि देने जाते हैं। बलि की प्रथा को धर्म के नाम पर  अधर्म से जोड़कर किये जाने से न जाने कितने निरपराध जीवों की जाने गयी।  मैंने इस घटना पर विचार कर विषद से अखबार में खबर दी और छपी भी।  बस इतना था कि मां जिरही की इसके पहले मैंने आराधना की और कदम बढ़ा  लिया। फिलहाल अभी तक मां की कृपा से ठीक हूं। सरकार, प्रशासन की अनदेखी  पर बलि की प्रथा आज भी चल रही है। कानूनन अपराध है। हमें इसकी जानकारी है। आप द्वारा उठाई गयी सामाजिक समस्या का निदान कुछ ऐसा हो कि समाज में  ऐसे नये लोग प्रवेश न करें और जो पहले से प्रवेश कर चुके हैं या प्रवेश कराने वाले हैं।  वे खुद अफसोस में हों। जिन उम्रों में देवी स्वरूपा कन्याओं की आराधना कर व्यक्ति  मुक्ति पा सकता है। इस उम्र में उन्हें ऐसे कार्यो में भेजने वाले मां बाप महापापी हैं।  पूर्वजों की इन बातों को उनके बीच फैलाये जाने की जरूरत है। मुझे तो नहीं लगता कि  ऐसे मां-बाप वास्तव में जिन्दा हैं, जिन्होंने ऐसे जघन्य पाप किये हैं। जरूर ही ऐसे कर्म करने वाले लोग धर्म या गरीबी को ढाल बनाये होंगे। मेरी ऊपर कृपा करके  ऐसे कर्म के मूल में धर्म या गरीबी का सहारा लिया गया है। इसका उल्लेख करने  का कष्ट करेंगे। ऐसे मामलों में वासना तो महज किताबों में पढ़ने की बात लगती है  या विश्वविद्यालयों के सेमिनारों में बोलकर ताली बजवाने का काम कर सकती है। बीमारी का वास्तविक पता लग जात तो निश्चत ही उपचार हो जाता है। कैंसर होगा  तो काटना होगा या एड्स होगा तो समाज को सावधान करना होगा। अन्य ईलाज  योग्य बीमारी होगी तो उपचार होगा। धर्म के साथ एक-एक कदम आगे बढ़ाये जाने  की जरूरत है। धर्म की विजय होगी और अधर्म का नाश होगा....हर कदम पर साथ..   

के द्वारा: pramod chaubey

प्रमोद जी नमस्कार, मुझे लगता है की आप मुझसे सारी हकीकत निकलवा कर ही रहेंगे.भाई साहब ये बिलकुल सत्य बात है की मै सर्व प्रथम उन महिलाओं के लिए ही चिंतित हूँ जो कि इस घ्रणित पेशे में अपनी जिन्दगी स्वाहा कर चुकी हैं.मै मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में रहता हूँ.कुछ वर्षों पहले तक यहाँ एक बड़ासा वैश्यालय भी था, जब एच आई वी का खतरा नहीं था तब भी इस शहर में अन्य कई रोग संक्रमित व्यक्ति अस्पतालों में आते थे जिनका उस वैश्यालय के नियमित चक्कर लगता था. यह आम रस्ते पर होने से वाहनों का आना जाना वहीं से होता था वहां के हालात देखकर ही सिहरन उठती थी. पुलिस वालों का अत्याचार अक्सर देखने मिलता था. लगभग बीस वर्षों बाद मै इस शहर में वापस आया नौकरी के कारण सन १९८० में जबलपुर चला गया था.अब यहाँ का वैश्यालय बंद हुए कोई एक दो वर्ष हो चुके थे, मगर अब वैश्यालय किस कालोनी में संचालित हो रहा है पता ही नहीं लगता ,जब तक वहां के रहने वाले संदिग्ध परिस्थितियां भांप कर पुलिस को सूचित ना करें. सही कहूँ तो अब बडासा वैश्यालय तो हमारे शहर में नहीं है किन्तु कितने वैश्यालय चोरी चुपके चल रहे है गिनती करना भी मुश्किल है. मेरे संभाग में मंदसौर और नीमच जैसे जिले हैं. आप सिर्फ मंदसौर से नीमच का ५० किलोमीटर का सफ़र तय करे आप जान जायेंगे मै क्यों चिंतित हूँ. पिछले एक डेढ़ वर्ष से पुलिस ने जो मुहीम चालू कि है उससे कम से कम तीन चार सौ लडकियां वहां से छुड़ाई गयी.आपको इनकी उम्र जानकार हैरानी होगी क्योंकि इसमे तीन चार वर्ष से ले कर दस बारह वर्ष तक कि बच्चियां थी. आपको और हैरानी होगी जब आप ये जानेगे कि इन में से कई बच्चों को उनके बाप या और रिश्तेदारों ने ही यहाँ बेचा था. लिखने को बहुत है मगर मै समझता हूँ कि इतने से ही आप सारा अंदाजा आसानी से लगा ही लेंगे कि क्यों प्रथम इनकी सुरक्षा और फिर क्यों किसी को इस पेशे में आने से रोकने के लिए कानून कि मै सिफारिश कर रहा हूँ.

के द्वारा: akraktale

वेश्या के पक्ष में कानून बनाने कि राय से अधिक सहमत हूँ. क्योंकि वह कानून इस पेशे में किसी भी तरह से आयी महिला के साथ न्याय करेगा. गली मोहल्ले में कहीं भी ऐसे अनैतिक कार्य नहीं हो सकेंगे. किसी महिला कि इच्छा के विरुध्ध कोई उसे इस कार्य के लिए मजबूर नहीं कर सकेगा, पोलिस द्वारा लगातार जो इनका शोषण हो रहा है वह रुकेगा. इनका नियमित स्वस्थ परिक्षण होने से इनकी और इनके ग्राहक कि अंततः समाज में जाने वाली गंभीर बिमारियों से मुक्ति मिलेगी. इनको नारकीय जीवन से मुक्ति मिलेगी....आदरणीय श्री अशोक जी आपकी इन बातों में दम है। आपकी भावनाओं को सलाम। वास्तविक कानून किसी के पक्ष में नहीं होता है। मुझे लगता है कि वेश्याओं संग हो रहे शोषण से आप जैसा संवेदनशील इंसान प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। अनियंत्रित यौन संबन्धों से समाज के पतन का अंदेशा है। वेश्याओं के पक्ष में कानून के बजाय मुझे लगता है- आपकी भावनाएं वेश्याओं संग हो रहे शोषण पर रोक और समाज की सुरक्षा दोनो से है। निश्चित तौर पर यौन संबंधों से होने वाले खतरों पर रोक के लिए वेश्याओं से संबंधित कानून में संशोधन की जरूरत है। सामाजिक मान्यता वेश्या को देना कभी वाजिब नहीं होगा परन्तु स्त्री के अभाव में जीवन जी रहे कामुक पुरूष या अनियंत्रित पुरूष से समाज में होने वाले खतरों पर रोक लगाने जैसी व्यवस्था बनायी जा सके तो निश्चत तौर पर समाज के लिए स्तुत्य होगा। कानूनी मान्यता देने से पूर्व उनके संभावित खतरों और उसके बचाव का व्यापक बंदोबस्त की जरूरत है। मुझे लगता है कि आप वेश्या के पक्ष में नहीं समाज के पक्ष में कानून के पक्षधर हैं। ऐसा है तो हम ऐसे कानून से भला कैसे इंकार कर सकते हैं। ऐसे कानून महज महिलाओं के लिए नहीं बल्कि पुरूष के लिए भी बनने चाहिए। वेश्या महिला ही नहीं बल्कि वेश्या पुरूष को भी चिह्नित किये जाने की जरूरत है, ताकि ऐसे चिह्निन व्यक्ति कानून की धाराओं से नियंत्रित हो...शेष चर्चा..आपके सवालों या विचारों के अनुरूप चलते रहेंगे।

के द्वारा: pramod chaubey

आदरणीय मनोज जी नमस्कार, मै आपकी बात पूरी तरह समझ रहा हूँ किन्तु शायद आप कानूनी संरक्षण का अर्थ ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं.कानून संरक्षण याने कोई स्कूटर का लायसेंस हासिल करने वाली बात नहीं है ये कि लायसेंस मिल गया है अब आप कहीं भी स्कूटर ले जाने में समर्थ हैं.ऐसा नहीं है इसमे समाज हित ही सर्वोपरि है.संरक्षण से समाज में फैलता ये रोग और इनसे होने वाले गंभीर रोग से समाज मुक्त हो सकेगा. यहाँ सिर्फ समाज पर सर्वाधिक विपरीत असर डालने वाली वैश्यावृत्ति कि ही बात कि है, आपने पुरुष के बारे में भी चिंता व्यक्त कि है.सिर्फ पुरुष ही नहीं सामाजिक पतन और भी कई जगह हुआ है किन्तु इस पर जानकारी में आते ही तुरंत कार्यवाही हो जाती है. अंत में मै यही कहना चाहूँगा कि आप कानून कैसा हो यह विचार रखे,कानून न बने इसका अनुभव तो हम कर ही रहे हैं. आगे भी आप मेरी विविध रचनाओं को जरूर पढ़ें, आप जैसे पाठकों के कारण ही मै बधाई का पात्र हूँ. धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

प्रिय श्री AKRaktale महोदय| सर्वप्रथम आपको सप्ताह का सर्वाधिक चर्चित ब्लोगर बनने की हार्दिक बधाइयाँ|तदुपरांत, आपने जिस खूबसूरती से अपने विचारों को संप्रेषित किया है वह निःसंदेह अद्वितीय है|आपके तर्कों से एक अंश तक सहमत हुआ जा सकता है किन्तु वेश्याओं के विधिक संरक्षण से सामाजिक व्यवस्था का कितना घनघोर स्खलन होगा इस बात का सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है|कृपया वेश्या शब्द को एक लिंग विशेष के सन्दर्भ में न लें|आजकल पुरुष वेश्यावृत्ति की भी बातें सुनने में आ रही हैं|ऐसी स्थिति में मात्र यौनिक संतुष्टि ही समाज और राष्ट्र का परम ध्येय बनकर न रह जाय |जब तक नीरो शासन में अभिरुचि प्रदर्शित करता रहेगा रोम कभी जल ही नहीं सकता|थोडा विचार कर देखिये की पति पत्नी के परस्पर सम्बन्ध हेतु एक स्थान विशेष और समय विशेष की आवश्यकता होती है|कोई भी शयनकक्ष का खुला प्रदर्शन चौराहे पर नहीं करना चाहता|तात्पर्य यह है की यह सभी जानते हैं की मैथुन के बिना संतानोत्पत्ति नहीं हो सकती (जिस तरह से निरोधी निवारक कानूनों के वावजूद अपराध कम नहीं हो सकता )किन्तु कोई भी पति पत्नी संतानों के सम्मुख एकांतिक क्षणों का खुला प्रदर्शन नहीं करते|मैं वेश्यायों के पुनर्वास के विरुद्ध नहीं हूँ और यह भी मानता हूँ की जब तक यह सृष्टि रहेगी तब तक यौन चर्चा और आनंद का सबसे बड़ा केन्द्र रहेगा|कभी धन के नाम पर तो कभी प्रेम के नाम पर देह का शोषण किया जाता रहेगा किन्तु यह सब परदे में ही रहने दे तो अच्छा है|सरकार वेश्याओं को चिन्हित कर उनके पुनर्वास के अन्य कल्याणकारी उपाय खोज सकती है|जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj

के द्वारा: tejwani girdhar, ajmer

शत्रुजी नमस्कार, आपकी बातों से लगता है, आप सिर्फ नाव का वोह हिस्सा देख पा रहे हैं जो पानी की सतह के ऊपर है. उस में सवार लोगों को पार कराने के लिए उसका कितना हिस्सा पानी में डूब जाता है उसकी आप को कल्पना नहीं है.पहले से पानी में आधी डूबी नाव में प्रत्येक व्यक्ति के सवार होते ही उसका कुछ हिस्सा और पानी में डूब जाता है.क्या डूबने में सुख और लाभ है? कोई शक नहीं. ये दुनिया का सबसे पुराना इंसानी मजबूरी का व्यापार है. सुन्दरता का प्रदर्शन कोई बुराई नहीं है. शादी के लिए लड़की देखने जाए हैं तो नकाब में बैठी लड़की देखकर शादी नहीं करते उसकी योग्यता के साथ ही सुन्दरता को भी निहारा जाता है.शराब के विज्ञापनों के कैलेण्डर में छपी अर्ध नग्न तस्वीरें साफ़ इस बात को दर्शाती हैं की किस तरह पैसों की आवश्यकता और पैसों के सतत प्रवाह के लिए महिलाये कितनी शोषित हो रही हैं. यदि ये उनका उतावलापण या उनको ख़ुशी देने वाला होता तो आपको सिर्फ कैलेण्डर में नहीं बल्कि आम सडकों पर ये महिलाएं नग्न अवस्था में ही दिखाती.

के द्वारा: akraktale

डॉक्टर साहब नमस्कार, अब तक मैंने जितनी भी प्रतिक्रियाएं पढ़ी हैं उससे मुझे मेरी छोटी सी बुध्धि अनुसार समझ में आ रही है वो ये कि सभी में इस बात कि घबराहट है कि सरकार कहीं वेश्याओं को कानून के नाम पर लायसेंस ही न दे दे, कहीं एसा न हो वेश्याओं को एसा अधिकार न दे दे जो समाज के लिए नासूर बन जाये.यदि आपको लगता हैकि आप कि बात पर गौर किया जायेगा तो अवश्य ही आप का ये कहना कि, कानून की जरूरत नहीं है, समाज और संस्कृति के खिलाफ जाता है. आपको इस वृत्ति कि रोकथाम और पुनर्वास दोनों को सम्मिलित करते हुए एक संतुलित प्रतिक्रिया देनी चाहिए.हमारी संस्कृति कि चिंता करने वालों को समझना चाहिए कि हमारी संस्कृति कोई आज कि नहीं है.हमारे यहाँ मुगलों ने फिर ब्रिटिशों ने हजारो बरस शासन किया, क्या हमारी संस्कृति लुप्त हो गयी? नहीं. हमारी संस्कृति भटके को राह दिखाने कि है और भटकाने कि नहीं है. भाई साहब मै एक बात और भी कहना चाहता हूँ कि जब से multimedia मोबाइल और तेज गति इन्टरनेट आये है तब से माता पिता का बच्चों पर पूर्ण नियंत्रण समाप्त हो गया है और ये कारण है कम उम्र बच्चों के इस गलत प्रवत्ति के ओर आकर्षित होने का. क्षमा करें काफी विस्तार दिया मैंने अपनी बात को मगर शायद ये मेरी मजबूरी है.पुनह प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

प्रिय अशोक जी ....नमस्कार ! प्रिय संतोष भाई .....नमस्कार ! आपके प्रेम को लौटाना मेरे बूते से बाहर है ..... आपसे विनम्र निवेदन है की जो बाते मैंने उस समय अपने लेख में कही थी बेशक उस समय वोह नई थी लेकिन आज इस मंच पर अलग अलग ब्लागरो द्वारा उसको अपने लेखों में कहा जा रहा है ..... इसलिए अब उस लेख को दोहराने का कोई फायदा नहीं ..... जिस तरह आप अपनी सीमाओं से बंधे हुए ठीक उसी प्रकार मैं अपनी इमेज से बंधा हुआ हूँ ..... आपने कहा है तो इसी विषय पर एक नया लेख जरूर पोस्ट करूँगा लेकिन वोह मेरे आज के अपने तरीके का होगा .... मैं उम्मीद कर्तक हूँ की आपको वोह पसंद आएगा ..... और रही बात कमेन्ट की तो इसी विषय पर मैंने एक हास्य वयंग्य कमेन्ट ! कमेन्ट !! कमेन्ट !!! लिखा था .... और जहाँ तक इनाम की बात है तो वोह तो हम सबके लाडले ओरिय अबोध जी को ही मिलना चाहिए ... क्योंकि मैं उनको कमेन्ट नहीं देता जोकि अपने खुद के ब्लॉग पर ही इतनी मेहनत से दिए गए कमेन्ट का उत्तर देना गवारा नहीं समझते .... आपके इसी प्यार का अभिलाषी

के द्वारा: Rajkamal Sharma

गुरु देव, प्रणाम , पहले तो मैं एक अपनी बात करना चाहता हूँ ,.. आपके लेखन के तो सब कायल हैं ही ,..आपकी प्रत्येक प्रतिक्रिया भी विशेष होती है ,.इससे मुझ जैसे नए ब्लागरों का मनोबल बहुत बढ़ता है ..JJ से एक आशा है ,..बेस्ट कमेन्टर ऑफ़ वीक/मंथ की एक रोचक कैटगरी बनाये और हम हर बार आपको और आदरणीय अबोध जी को बधाई दे सकें,. जैसा कि आपने कहा कि , इस विषय पर अपने विचार पहले रखे थे......मुझे अफ़सोस होगा यदि आपके विचारों को ना पढ़ पाया इसलिए आपसे विनती है कि आप भी जरूर लिखें ,....कुछ तंगी और इच्छा ना होने के बावजूद मैं भी इस पर विचार जरूर रखूंगा ,...इसका प्रमुख कारण है मेरे ब्लाग का नाम .. सभी ब्लागरों की तरफ से आपको हार्दिक धन्यवाद

के द्वारा: Santosh Kumar

वेश्या के पक्ष में कानून बनाने की राय से अधिक सहमत हूँ. क्योंकि वह कानून इस पेशे में किसी भी तरह से आयी महिला के साथ न्याय  करेगा....श्री अशोक जी..आपके विचारों से कत्तई  सहमत नहीं हूं। इसे पेशा नहीं बनाया जा सकता है। आपसे  एक बार फिर से इस विषय पर विचार करने की अपेक्षा करूंगा,  क्योंकि आपमें उन चीजों को हमने महसूस किया है, जिससे  वैश्वविक स्तर पर भारत को एक बार फिर से स्थापित करने  में मदद मिल सकेगी। आपका यह लेखः स्वादिष्ट भोजन के  अंत में किसी कंकड़ से कम नहीं है, जिससे दांत टूट जाय  और इंसान  दुबारा भोजन ही नहीं कर सके। मेरी बातों से कष्ट  पहुंचने पर मुझे क्षमा करेंगे। 

के द्वारा: pramod chaubey

भाई अमरसिंहजी क्षमा करें आपकी बात मैं समझ नहीं पा रहा हूं ,आप कौन से विस्फोट की बात कर रहे हैं, क्या आप कह रहे हैं कि आज सभ्य लोगों की रिहाईश में कोई भी अनैतिक कार्य कर रहा है वह ठीक है बजाय के कानून व्दारा शहर के  बाहर एक निश्चित स्थान पर इनको अनुमति दी जाये. अवश्य हमारे देश में कई धर्म हैं किन्तु ये किसी मजहब का नहीं मानव धर्म  के विचार का विषय है. और रही बात शिव सेना कि तो उनको मैं देख चुका हुं जब पिछले वेलेन्टाईन डे पर बहन के साथ जा रहे भाई को बताने के बाद भी बुरी तरह पीटा.ये किसी को रोटी नहीं दे सकते.सिर्फ प्रशासन के समर्थन से ही ये अशाँति फैला सकते हैं.

के द्वारा: akraktale

यह हमारे समाज में काफी समय पहले से ही चलता आया है किसी न किसी रूप में फिर चाहे वोह देवदासी प्रथा के रूप में हो या फिर नगरवधू के रूप में ..... यह समाज का कोढ़ बन कर हरेक युग में अलग अलग रूपों में अलग -२ नामो से मोजूद रहा .... आपकी तर्कसंगत बातों से असहमत होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता वैसे मैं शुरू से ही इस हक में रहा हूँ लेकिन अफ़सोस की इस मंच के शुरूआती दिनों में इसी विषय पर लिखा हुआ अपना लेख मैंने डिलीट कर दिया था क्योंकि तब यह हमारे बुद्धिजीवी ब्लागर इस तरह की बात करने वाले को सूली पर जी चढ़ा देते थे .... इसलिए अब इनके बदले हुए रूप और रुख को देख कर मुझको खुशी और हेरानी हो रही है ..... बदली है जो हवा तो यह सभी भी बदल गए है यह पहले भी ठीक थे अब तो और भी ज्यादा सही ही गए है :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/18/“जब-जागरण-गांव-की-सभी-शादी/

के द्वारा: Rajkamal Sharma

आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम वास्तव में यह सत्य है कि किसी वाद या वृत्ति को रोकने के लिए कानून भर बना देना पर्याप्त नही है | समाज में जहाँ भी जो गलत हो रहा है कहीं न कहीं पूरा समाज उसके लिए जिम्मेदार है | कोई नारी कोठे पर बैठ जाने भर से वेश्या नही बन जाती, वेश्या तो इस समाज का कोई न कोई सभ्य कहा जाने वाला व्यक्ति ही उसे बनाता है | फिर उनके कार्य को मान्यता देने वाले कानून पर इतना हो हल्ला क्यों ? कानून बनने कम से कम इनके द्वारा समाज में फ़ैल रही एड्स जैसी बिमारियों से तो इनमे स्वयम व् समाज में जागरूकता तो आएगी | पाठक गण क्षमा करें, परन्तु या तो हम समाज से इसे मिटने का स्वयम संकल्प लें या फिर संकीर्णताओं से बाहर निकलें |

के द्वारा: naturecure

नमस्कार जी, आप का कथन सही है की चोरी के लिए , डकेती के लिए , बलात्कार के लिए , आतंकवाद के लिए ... इन सभी की रोक के लिए क़ानून बने हैं पर इनको रोका नहीं जा सकता पर कुछ हद तक तो रोक है ही ... क़ानून बनने से अपराध को खतम तो नहीं किया सकता पर कुछ कम तो किया ही जा सकता है अगर वस्यवृति को कानूनी वैधता प्राप्त हो जाएगी तो जो आज चोरी छिपे हो रहा है वो खुल कर होगा और कोई उसको रोक नहीं पायेगा क्यूंकि वो भी रोजगार का साधन बन जायेगा.. मन की इसमें मन मर्ज़ी से कोई नहीं आता सबकी कुछ न कुछ मजबूरियां रही होंगी पर इसको कानूनी वैधता दिलाकर हम अपने देश की गौरवता और संस्कृति को तो दाव पर नहीं लगा सकते हैं .. हमारा देश हमारी सभ्यता और संस्कृति के द्वारा जाना जाता है हमें भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए की अपने देश की गौरवता को बनाये रखे .आप सही कह रहे हैं की ये इतना आसान नहीं कि भिगोया धोया और हो गया ... अगर इसके विरुद्ध कानून है तो जिनको जो करना है वो तो करेंगे ही पर खुले आम तो नहीं करेंगे.. आपने उन औरतों के बारे में सोचा जो इसमें लिप्त हैं बहुत अछा सोचा पर कुछ औरतों के लिए पूरी औरत जाती को तो दाव पे नहीं लगा सकते हैं और बात सिर्फ औरत जाती कि ही नहीं देश कि गरिमा कि भी है अतः जो भी निरनय होगा उससे पुरे देश कि संस्कृति और मन मर्यादा प्रभावित होगी ... धन्यवाद...

के द्वारा: mparveen

वैश्या वृति स्त्री और समाज दोनों के लिए अत्यंत शर्म का विषय है. वैश्या वृति को कानूनी मान्यता देने में देश में विस्फोटक स्थितिया पैदा कर सकते है, जिनका हल निकाल पाना शायद ही उस समय किसी के लिए भी संभव हो. आज जो भी लोग वैश्यावृति का समर्थन कर रहे है उनमे से अक्सर जर्मनी का उदहारण दे रहे है की किस प्रकार उस देश में वैश्यावृति को कानोनी मान्यता मिली और कामयाब भी रही किन्तु भारत की स्थिति जर्मनी से बहुत ही अलग प्रकार की है. जर्मनी और अन्य पश्चिमी देशो की तुलना में यहाँ पर अधिक विविध धर्मो और जातियों के लोग एक साथ रहते है और जिनकी विचारधाराए अलग अलग होने के बावजूद भी यहाँ पर एक मत हो जाती है की वह वैश्यावृति को कभी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं कर सकेंगे. और न ही कभी वह मानसिक रूप से भी पश्चिमी लोगो की भाति उन्मुक्त हो सकेंगे क्योकि यहाँ की परम्पराए और धार्मिक दृढ़ता लोगो में इतनी अधिक है की वह इसे चाह कर भी इसे स्वीकृति देने में संकोच करेंगे. अभी पिछले कुछ समय पहले की ही बात ले लीजिये पूना में रात को डांस क्लब में शिव सैनिको ने लड़के और लडकियों को पीटा. वैलेंतिने डे पर भी युवा जोड़ो के पिटने की खबर हम अक्सर सुनते ही रहते है. अब यहाँ पर यह सोचना होगा की यदि वैश्यावृति को वैधता मिल जाती है तो उन लोगो का क्या अंजाम होता है जो उनके अड्डो पर चुन चुन कर पकड़ कर बाहर लाये जाते है. स्थिति इससे भी कही अधिक विध्वंसक होगी यहाँ पर मात्र एक संगठन की बात की है इस प्रकार के अन्य सम्प्रदायों के और भी अनेक संगठन विधमान है जो इसका निश्चित ही विरोध करेंगे. http://singh.jagranjunction.com

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: शेष नाथ योगी

वर्तमान समय में कुछ पेशे ऐसे है जो सीधे समाज के लोगो को बहुत प्रभावित करते है, अर्थात पूरी तरह से समाजसेवा ही है. किन्तु जब वह सामजिक कार्यो ने व्यावसायिक रूप लिया है उसके बाद से ही इस अव्यवस्था का उद्गम होना प्रारम्भ होने लगा. जैसे डोक्टर, वकील, अध्यापक, पुलिस, जज, पत्रकार, नेता आदि यह सभी सामाजिक सेवाओं के अंतर्गत ही आते है. पहले लोग डोक्टर बनना चाहते थे क्योकि उन्हें गरीब लोगो की बीमारिया दूर करने का संकल्प ध्यान होता था. कोई वकील या पुलिस बनना चाहता था तो वह समाज से अपराध समाप्त करने के लिए उसमे जाना चाहता था. अध्यापक अच्छी शिक्षा के द्वारा भावी पीड़ी को तैयार करने का संकल्प लिए होते थे तो नेता तो पूरी तरह से समाज के समर्पित कार्य होता था. किन्तु सबसे पहले तो डॉक्टर और वकील या जज बन्ने के लिए शिक्षा ही इतनी अधिक महँगी हो चुकी है की कोई आम व्यक्ति अपनी संतान को इसकी पढ़ाई करवा ही नहीं पाता और जो लोग उसमे सफल होते है वह पहले अपने द्वारा लगाए धन को प्राप्त करने का प्रयास करते है. जहा से इस अव्यवस्था का प्रारम्भ होता है.

के द्वारा: Amar Singh

श्रद्धेय श्री अशोक जी,  सादर प्रणाम प्रायश्चित जैसे ही मन में आ जाय, वैसे ही प्रायश्चित प्रारंभ हो जाता है।  हम तो(प्रायः हर कोई) इस जन्म में तो सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं।  पिछले जन्म के कर्मो से उपजी स्थितियों पर प्रायश्चित जैसी बातें मन में हैं, तो निश्चित तौर पर आप के पिछले जन्म के कर्म अच्छे थे,  जिसके कारण आपका का मन प्रायश्चित की ओर जा रहा है।  सत्यवादी राजा हरिश्चद्र की स्थितियों से हम सभी वाकिफ हैं।  मुझे लगता है कि अशोक जी हम या आप अभी वैसी स्थितियों  से नहीं गुजर हैं। भगवान राम का चौदह वर्ष का वनवास क्या  कम था। हम पर, आप पर ईश्वर की विशेष कृपा है कि जो  अन्य की अपेक्षा कृत(हमसे या आपसे नीचे की स्थिति में हैं) हम या आप बेहतर स्थिति में स्थिति में हैं।    अगली पंक्ति आपके मुस्कराने के लिए... फिर से आप पिछले जन्म के पिछले जन्म से जुड़े सवाल न  पूछ लीजियेगा। आप मुझपर अपना आशीर्वाद बनाये ऱखियेगा। 

के द्वारा: pramod chaubey

आदरणीय अशोक जी. प्रणाम सांसद मजे(खिलाड़ी) हैं। उनके कर्मो के बारे में जनता जानती है। अशोक जी।  एक कहानी याद आ गयी। इस कहानी को सांसदों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उनके मान-अपमान छुई-मुई की तरह हो गयी है। मठाधीश के नहीं रहने पर कई शिष्यों में एक मठाधीश बनता है तो दूसरे को पीड़ा होती है।  मठाधीश नहीं बनने पर शिष्य( पुराने ) गुरू से मिलकर कहता है कि गुरू जी  जो मठाधीश बना है, वह ठीक नहीं है। गुरू जी ने चेले से कहा कि  इस जन्म  में जो मठाधीश होता है, वह अगले जन्म में कुत्ता बनता है। गुरू जी का जबाब  सुनकर शिष्य संतुष्ट हो जाता है और चला जाता है। लेखों से तो लगता है कि  आप समाज की पीड़ा से अत्यंत द्रवित हैं, जिसे हम वाजिब कह सकते हैं पर  इस प्रतिक्रिया के बाद भी आप न मुस्करा सके तो मेरी प्रतिक्रिया अधूरी होगी। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में आपका स्नेही..प्रमोद.

के द्वारा: pramod chaubey

के द्वारा: Harish Bhatt




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