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64 Posts

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akraktale


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खुशी कैसी

Posted On: 31 Dec, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस लोकल टिकेट में

54 Comments

प्रलय की रात.

Posted On: 20 Dec, 2012  
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जनरल डब्बा मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

50 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

के द्वारा: pragati pragati

कभी तुम झाँक लो देखो जरा उस मन की तो बूझो, बुझी उम्मीद है जिसकी अँधेरा अब सताता है/ शमाएँ तुम जलालो चढ के जा जाकर मीनारो पे, नही कर पाओगे रोशन यही अब दिल में आता है/ सबक इस हादसे हालात से पाकर के तुम समझो, खुशी कैसी लगे जब कोई इक मातम मनाता है/ पूर्णता किसी में भी नहीं होती आदरणीय श्री रक्ताले जी ! न इंसान में , न व्यवस्था में , न कानून में , न संसार में ! कहीं न कहीं , कोई न कोई कमी अवश्य रहती ही है ! लेकिन इन कमियों को पहिचान लेना , उनको दूर करने के लिए प्रयासरत रहना ही तो मानव का कर्त्तव्य और उसकी जिम्मेदारी बनती है ! आपने नव वर्ष के मुबारक मौके पर जो शब्द प्रस्तुत किये हैं , एक सच की तरफ इशारा करते हैं ! बहुत बढ़िया , बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ रहा हूँ , और बेहतरीन शब्द पढ़ रहा हूँ !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय रक्ताले जी नमन प्रतिक्रिया हेतु आभार आपने भी इस कविता में सही ही कहा है की महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं आजकल महिलाओं की कहीं भी सुरक्षा नहीं हैं आश्चर्य है की rape की घटनाएँ रात के नौ बजे भी हो रही हैं अब दर्द दवा तक पंहुचा है सरकार महिलाओं के लिए फैसले ले रही है पर यह फैसले कागजों तक ना हो बल्कि इन पर आगे भी काम हो मेरा इस लेख का मकसद दिल्ली के आपराधिक राजधानी होने का कारण बताना था और उस लड़की के लिए इन्साफ की लड़ाई लड़ना था और दिल्ली को आपराधिक राजधानी होने से बचाना था सो मैंने अपने मकसद पुरे कर लिए में पत्रकार बनकर देश की साफ़ छवि बनाना चाहता हूँ और कानूनों को सख्ती से लागू करना चाहता हूँ येही मेरी प्राथमिकता होगी धन्यवाद

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

के द्वारा: kpsinghorai kpsinghorai

के द्वारा: akraktale akraktale

श्री रक्ताले जी एक और समस्या जो वृहद् स्तर पर हमारे सामने आ रही है उसे भी ध्यान देना आवश्यक है.. मुझे पिछले साल आर एस एस के सरसंघचालक श्री मोहन भगवत जी मिलने का मौका मिला , तो वह पर यही प्रश्न खड़ा हुआ की क्या हम दो हमारे दो की जो निति है वो ठीक है ?? उन्होंने कुछ विचारणीय प्रश्न रखा ... १) जो लोग इस निति का पालन करते है वो समाज के समृद्ध वार्ड से ज्यादातर आते है या फिर बुद्धिमान होते है और अपने बच्चो को पढ़ाने लिखाने लायक भी होते है और ज्यादातर तो ऐसे होते है जो एक दो और बच्चे हो तो उन्हें भी पढ़ा सकते है. और जो लोग ८-१० बच्चे पैदा करते है वो कम दिमाग , गरीब और अपने बच्चो को पढ़ाने के लायक नहीं होते ... जिस कारण हमारे समाज में ऐसे लोग जो की मूर्ख है , अनपढ़ है की संख्या अनुपातिक रूप से बुद्धिमानो और पढ़े लिखो से बढ़ जा रही है .. लेकिन ये तो एक छोटा सा खतरा है परन्तु बड़ी बात ये है की जैविक स्तर पर आगे चलकर भारत वर्ष में खराब और घटिया जीनो की अधिकता हो जाएगो जिससे समाज में पैदईसी मूर्खो की संख्या बहुत बढ़ जाएगी. २) एक सम्प्रदाय विशेष के लोग भारत सरकार के इस नियम कानून को नहीं मानते और उनकी संख्या भी तेजी से बढ़ रही है और जब भी उनकी संख्या २० % के आस पास पहुचती है वो देश को खंडित कर देते है और एक हिस्सा ले लेते है फिर हिन्दुओ के रहने की ज़मीन कम हो जाती है लेकिन फिर वह सम्प्रदाय अपना थोडा सा बीज उस बचे स्थान में भी डाल देते है फिर नयी फसल तैयार होते ही नयी ज़मीन माँगते है इस तरह से उनका काम तो चलता रहेगा पर हिन्दुओ को रहने ,खाने और संशाधन की लगातार कमी हो रही है. ये दोनों बाते निकट २०-५० साल के लिए महत्त्व की भले ही न हो पर सैकड़ो वर्षो बाद ये महत्वपूर्ण प्रश्न हो जायेगा सर्व्श्रेस्थ ब्लॉगर बनाने की सुभकामना ..

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

अशोक जी नमस्कार बेस्ट ब्लॉगर ऑफ द वीक बनने के लिए आपको हार्दिक बधाई।… आजकल आर्थिक परिस्थितियों के चलते लोग एक संतान का कांसेप्ट लेकर चलते है पर सामाजिक या व्यक्तिगत नज़रिए से देखा जाये तो इससे कई विपरीत हालत भी पैदा हो जाते है !एक पूत यमदूत" सही में यदि एकलौती संतान हो तो माता पिता " एक ही तो है " करके उसकी हर ख्वाहिश पूरी कर देना कई बार उसे जिद्दी भी बना देता है .!छोटा या बड़ा भाई बहन होने से उसके अन्दर शेयर करने की आदत भी विकसित होती है !बच्चा प्रेम करना सीखता है ,एक दुसरे का ध्यान भी रखने की भावना आती है !भाई बहन होने से बच्चे को भावनात्मक संबल भी प्राप्त होता है बहुत सारी बाते बच्चे माता पिता से नहीं कह पाते पर सुख दुःख की हर बात भाई बहन एक दुसरे से कह देते है ! एकाकीपन का दंश क्या होता है ये तो कोई एकलौती संतान ही बयां कर सकती है !जहाँ तक देखा जाये तो संतान चाहे एक हो या चार ...वृदावास्था में अकेलापन सबके लिए समान है .लेकिन घर में कम से कम दो संतान होनी ही चाहिए .......संतुलित विचारणीय आलेख .

के द्वारा: D33P D33P

महिमा जी            सादर, आपका अदारेया यमुना जी से सहमत होने का विचार सही है इस विचार को नकारा नहीं जा सकता.क्योंकि कई परिवार इकलौती संतान तक सीमीत है. वृद्धों वाले विषय पर मैंने वहाँ भी कहा था कि यह एक समुचित विषय है. मगर आज चीन जैसी महाशक्ति जिसने एक सन्तान को क़ानून बना कर लागू किया वह आज इस पर पुनः विचार कर रहा है तो हमें विचार करने में क्या हर्ज है. सामाजिक ढांचा किस तरह चरमरा जायेगा इस पर विचार करने में क्या हर्ज है और जैसा कि आपने कहा है यह सिर्फ मध्यम वर्ग कि उथल पुथल है अन्य वर्गों कि इसमें भागीदारी नहीं है आवश्यकता उन अन्य वर्गों के मानस में परिवर्तन लाने कि भी है. आर्थिक परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं किन्तु देश और समाज हम सबका है. आपके विचारों का ससम्मान स्वागत है. यह आलेख लिखा भी इसी उद्देश्य से था कि सभी अपने विचार रख सकें.  आपकी स्न्हेपूर्ण बधाई के लिए सादर अभिवादन.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय अशोक सर , सादर नमस्कार , देर से आने के लिए क्षमा चाहती हूँ .. आपको ढेर सारी बधाई “बेस्ट ब्लोग्गर ऑफ़ द वीक” के लिए.... वाकई में आपने इकलौती संतान की भावनातमक , मानसिक और सामाजिक परिवेश में रख कर समीक्षा करते हुए उसकी जरूरतों को ध्यान में रख कर आपने बहुत ही तार्किक आलेख की रचना की .. जो हर अर्थ में सही है नकारा नहीं जा सकता / पर ये भी एक खतरनाक सच्चाई है है की अरबो की जनसख्या .. हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा रोटी , नौकरी और रहने की समस्या से हमारा समाज जूझ रहा है .... .. और जिन माता -पिता के ५ -६ संतान होते है और सब नौकरी पेशा है और दूर रहे है है तो वैसे भी वे वृदावास्था में अकेलेपन को ढ़ोने को मजबूर होते हैं ... जीवन है तो समस्याएं हैं .. चाहे इकलौती हो या दो हो बस रूप बदल जाता है .... पर अरबो की जनसंख्याँ नियंतरण सिर्फ शिक्षित माध्यम वर्ग ही समझ पा रहा है और सहयोग भी कर रहा है और करना भी होगा नयी चीजे आती है तो नए समस्याएं भी आती हैं उसका समझदारी से निराकरण करना ही बुद्धिमानी है इसलिए मैं यमुना जी के दिए गएँ तर्क और सुझाव से भी सहमत हूँ ..... समसामयिक संतुलित विचारणीय आलेख और सम्मान के लिए पुन बधाई और शुभकामनाएं

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

सुमन जी           सादर, बहन जी सर्वप्रथम तो मै क्षमा चाहता हूँ कि आपके ब्लॉग पर किसी आलेख पर प्रतिक्रया नहीं कर पाया पिछले कुछ दिनों किसी कारण से मेरी सक्रियता कम थी शायद यही वजह रही हो. आप यकीन मानिए कि यहाँ से निकलते ही मै सर्वप्रथम आपके ब्लॉग पर प्रतिक्रिया दूंगा.            आपने अपने अनुभव के आधार पर जो विचार रखे हैं वह विषय पर और अधिक गम्भीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं. आपने लिखा है कि दो संतानों का सुख माता पिता को मिल सकता है. यहाँ माता पिता के सुख के साथ हि सन्तान कि मानसिक स्थिति पर चर्चा कि गयी है. एक से अधिक सन्तान के कारण सम्पत्ति विवाद का आपने नया विचार रखा आपका बहुत बहुत आभार.  आपकी बधाई स्वीकार है. धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

अशोक जी नमस्कार , भाई विषय बढिया है मै भी इकलौती हू पापा के रहते कभी नहीं लगा की भाई बहन होने चाहिए सुरछा प्यार परिपूर्ण था जिसका आत्म विस्वाश ज्यादा था और पिता समाजिक थे तो मै भी रिश्तो को बखूबी निभाती थी और ज्यादा समझ थी हा जब पापा का देहांत हुआ तो भाई की कमी पहली बार महसूस की अंतिम संस्कार के समय खुद को बहुत अकेला पाया . मेरे भी एक ही एक पुत्र है पति बड़े परिवार से है परिवार में सबको दो संताने है पर उन्होंने कहा हम एक सन्तान को आज केसमय में ज्यादा बढिया तरीके से परवरिश कर पायगे समय बदल रहा है वो न्यायिक सेवा में होने केनाते कहते है की अधिक झगड़े सगे भाई के बीच है एक से भले दो होते है पर जरूरी नहीं की आपका अकेला बच्चा एकाकी महसूस करे हां अकेले की जिम्मेदारी ज्यादा होती है हमारा पुत्र नौ साल की उम्र में ही हमसे अधिक समाजिक रिश्ते निभाता है पर फिर भी मै कहती हू की दो बच्चे यदि लड़का लडकी दोनों हो तो दोनों संतानों का सुख माता पिता को मिल सकता है बाकी सब विचार परवरिश पर निर्भर करता है समय के साथ भवनाये भी मूल्य भी सब बदलते रहते है . तभी तो समाजिक अपराध दहेज़ भाई के जमीन के झगड़े दम्पति में विखराव आदि चीजे घटती है सार्थक लेख है सबके लाभ हानि है कुछ न कुछ .

के द्वारा: sumandubey sumandubey

रक्तलेजी, निश्चित तौर पर इस लेख की यह बात शायद कुछ स्वीकारने में थोड़ी असहता हो कि अगर दो बच्चे करेंगे तो जनसंख्या बढ़ेगी। इसको लेकर आलोचना स्वाभाविक है परंतु यह बात भी उतनी ही सत्या है कि एकल परिवार की व्यवस्था के दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पारिवारिक ताने-बाने में अब खालीपन महसूस होता है। हालांकि, यह आपके लेख का अगला पड़ाव हो सकता है परंतु जहां तक दो बच्चों की जो बात आपने कही है वह जनसंख्या का हौवा दिखाकर बुरी नहीं कही जानी चाहिए। आपने कोई १२-१५ बच्चे पैदा करने की बात नहीं कही है। अगर दो बच्चे परिवार में रिश्तों को लेकर सुख का आधार बन सकते हैं तब इसमें कोई हर्ज नहीं। हां, इतना अवश्य है कि अगर कोई इतना भार नहीं सह सकता तब उसमें बंदिश भी कहां हैं। वैसे इसका उजला पक्ष यह भी है कि लोग अब अपने बच्चों के कैरियर के प्रति चिंतित हैं परंतु इसके साथ ही स्याह पक्ष यह भी है कि अकेलेपन से बच्चे भी अवसादग्रस्त हो रहे हैं। आपने बात को बड़ी ही संजीदगी के साथ प्रस्तुत किया, इस हेतु आभार....

के द्वारा: kpsinghorai kpsinghorai

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

व्यावहारिक जीवन पर प्रभावपूर्ण प्रस्तुति, पठनीय; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "हम पूरी तरह घर में देख भाल करके पुत्री को सक्षम बना कर उसे हमारे रीती रिवाज के अनुसार उसे ब्याह देते है क्योंकि यही रीत है.उस लडकी का ससुराल के बाद बहुत ही प्रिय स्थान अपने माता पिता का घर होता है.अभिभावकों कि मृत्यु के पश्चात उनकी इकलौती सन्तान के लिए वह ठिकाना खत्म हो जाता है जहां वह अपने सुख दुःख कि बात निसंकोच कह सके यदि उसका कोई सहोदर होता है तो वह उसके पास जा कर किसी अपने के होने का सुखद एहसास को पाती है किन्तु जब एकलौती संतान हो तब उसके लिए सिर्फ अपना ससुराल ही सबकुछ हो जाता है यह एक बहुत गम्भीर कारण है क्योंकि यह उसके मन में कुंठा पैदा कर देता है जो कभी अहंकार के रूप में भी देखने को मिलता है.यह सिर्फ लडकियों के लिए ही नहीं है लडके या ये कहूँ कई पुरुषों को मैंने वृद्धावस्था में भी ऐसी समस्याओं के कारण दुखी देखा है."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय रक्ताले जी नमन में २८ अक्टूबर को अपने गाँव से दिल्ली आया हूँ तो आपकी इस रचना पर द्रष्टि डालने का समय नहीं मिल पाया फिर अब द्रष्टि डाली इसके लिए में आपसे शमा चाहता हूँ मेरा मानना है की एक बच्चे को पैदा करना कई लोगो की मज़बूरी होती है और कईयों पर दबाव एक बच्चा कई लोग अपनी निम्न मजबूरियों के कारण पैदा करते हैं जैसे कई लोगो की आर्थिक स्थिति नहीं सही होती बच्चे के लिए कई चीजें चाहिए तो उसके लिए धन नहीं होता इसलिए भी लोग एक बच्चा करते हैं कुछ पर परिवार वाले दबाव डालते हैं की एक बच्चा पैदा करो वैसे ज्यादा बच्चे होना भी ठीक नहीं कुछ लोग ज्यादा बच्चे भी पैदा करते हैं जो देश के लिए सही नहीं है बच्चो की ज्यादा संख्या भी कई परिवारों में होती है इससे जनसँख्या बढती है जो देश के लिए खराब है हाँ आपका यह कहना भी सही है की एक होने से बच्चे एकांकी भी हो जाते हैं तो इस हेतु में कहना चाहता हूँ की बच्चे दो से ज्यादा न हो यह देश के लिए हानिकारक है मेरा मानना है की एक बच्चा पैदा करना देश की जनसँख्या को स्थिर करने के लिए बड़ा कदम है आजकल कई परिवार वाले ज्यादा बच्चे पैदा कर देते हैं इसका कारण उनकी शिक्षा कम होना भी है और ज्यादा रुढियों का होना भी है कोई परिवार नियोजन नहीं करना चाहता इसलिए सरकार को जनसँख्या स्थिरीकरण पखवारे लगाने पड़ते हैं वैसे देश में जनसँख्या बढ़ने से रोकने के लिए छोटा परिवार सुखी परिवार यही सिद्धांत कारगर होगा ऐसा मेरा मानना है येही मेरा विचार है अगर आपको कुछ गलत लगे तो में इसके लिए ह्रदय से शमाप्रार्थी हूँ आपका आलेख अच्छा लगा धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

बड़ा सुन्दर आलेख है श्रद्धेय अशोक जी । जनसंख्या विस्फ़ोट दशकों से हमारे देश के लिये एक समस्या है, जो निरन्तर विकराल स्वरूप लेता जा रहा है । परन्तु इकलौती संतान रखने के लिये बाध्य होना आम नागरिक का जनसंख्या नियंत्रण के सापेक्ष जागरूकता बढ़ जाना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से जागरूक होने का परिणाम अधिक है । हम पाते हैं कि यहाँ भी नियंत्रण का झंडा उठाने वाला वही मध्यवर्ग है, जिसके निरीह और कमज़ोर कंधे पर सबसे अधिक टैक्स पे करने से लेकर कानून को कानून मानने जैसी अन्य-अनेक ज़िम्मेदारियाँ थोप दी गई हैं । शेष अपर या लोवर वर्ग के लिये कम या अधिक संतान का होना न होना कोई मायने नहीं रखता । लोवर की संतान होश सम्भालते ही अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, तो अपर के लिये संतानोत्पत्ति एक शगल मात्र है, फ़िगर आदि सबकुछ बैलेंस करते हुए वे अपनी रिक्वायरमेंट के आधार पर निर्णय लेते हैं । एक मध्यवर्ग ही है, जिसे संतान की पढ़ाई-लिखाई से लेकर उसकी शादियों पर होने वाले खर्च की चिन्ताओं के बीच अपने बजट और संतानोत्पत्ति के सन्तुलन को देखना पड़ता है । संयुक्त परिवार प्रथा के ध्वस्त होने के पश्चात आज पति-पत्नी का व्यक्तिगत परिवार एक बेटे और एक बेटी की उत्पत्ति का ही हिमायती अधिक है । औसतन यदि पहले बेटा हो गया, तो लोग विराम लेना भी पसन्द करते हैं, अन्यथा बेटी के पश्चात बेटे के लिये ट्राई करने से कोई नहीं चूकना चाहता । जहाँ वास्तव में जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता है, वहाँ किसी तंत्र का कोई ज़ोर नहीं चलता । धन्यवाद !

के द्वारा:

अशोक जी सार्थक लेख के लिए बधाई लेकिन कुछ भ्रान्तिया रह जाती है उनका समाधान हुए बगैर एक बच्चे की सार्थकता संदिग्ध है हमारे पड़ोस में चाइना में आज से लगभग २० या २५ वर्षो में बच्चो पर रोक लगाने का परिणाम ही है कि आज पूरे विश्व में सबसे बूढों का देश बन क्र खड़ा है और वाही हमारा देश नौजवानों का देश कहलाता है अब यह तो विशेषज्ञों को विश्लेषण करना चाहिए कि क्या हमारे लिए अनुकूल रहेगा जहा तक मेरा सम्बन्ध है तो मै इसी विचार से सहमत हु कि बच्चे दो होने चाहिए जहा तक परवरिश का सवाल है तो बजाय इसके कि एक बच्चे को उसके नासर्गिक सुख से बंचित करने का हमें कोई अधिकार नहीं है स्वाभाविक रूप से एक बच्चा अपना साथी चाहता है जो उसके साथ खेल-कूद सके और साथ ही एक दुसरे से बहुत कुछ सीखने-सिखाने को भी मिलाता है तथा एक दुसरे के बारे में कुछ गलत होने पर अगर एक बच्चे को समस्या हो जिसे अपने अभिभावकों से शेयर नहीं कर पता उनके बारे में भी ज्ञात हो सकेगा फिर हम दो हमारे दो से जनसँख्या में वृध्धि का प्रश्न कहा से पैदा होता है?. सभी कुछ कैरियर ही नहीं होता कुछ समाज और परिवार की आकांच्चा होती है उन्हें भी पूरा करना हमारी ही जिम्मेदारी है और इससे भागना वास्तविकता को नकारना ही है चाहे उसके लिए किसी प्रकार का तर्क गढ़ लिया जाय|

के द्वारा:

अशोक जी आपकी ये पोस्ट दो दिन कुछ व्यस्त रहने के कारण मैं नहीं देख सकी.आपका विषय मेरी रूचि का विषय जो मेरे चिंतन का एक विषय है,परन्तु ये समस्या बड़ी गंभीर है,जो एक ओर तो आगामी पीढ़ियों के लिए नवीन समस्याओं की जनक है,दूसरी ओर देश की बढ़ती जनसंख्या,संसाधनों का असंतुलित उप[भोग ,अनेकानेक समस्याओं को जन्म दे रही है,विकराल बना रही है ये सत्य है कि सीमा तो कोई है नहीं किसी को दो बेटे ही चाहियें तो किसी को एक बेटी एक बेटा , संतुलन के लिए दोनों ही जरूरी हैं,आज केवल नौकरी पेशा ही नहीं संयुक्त परिवारों में रहने वाले भी एक की इच्छा रखते हैं.कोई कोई न कोई विकल्प खोजना ही होगा समस्या के संतुलित समाधान के लिए.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरेया यमुना जी                 सादर नमस्कार, सर्वप्रथम आपने सभी के विचारों पर प्रतिक्रया देने के लिए बिन्दुवार लिखा इसके लिए मै आपका ह्रादयातल से आभारी हूँ.                  आपने सही कहा है आर्थिक सम्पन्नता अपने परिवार के साथ ही दूसरों के परिवार के लिए भी काफी सहायक सिद्ध होगी.                 वृद्धों को साथ रखने कि देश में गंभीर होती समस्या अपने आप में एक विषय है.                   आपकी प्रतिक्रया में एक विरोधाभास नजर आ रहा है जब एक भाई अपनी इकलौती सगी बहन से रिश्ता नहीं निभा सकता तो वह अन्य रिश्ते किस तरह निभाएगा. मगर खुशी कि बात यह है कि  इकलौता होने पर यह समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी क्योंकि इकलौते का चलन चाचा मामा फूफा या मौसी जैसे रिश्तों को समाज से मिटा ही देंगे तब निभाने के लिए माता पिता, दादा दादी या नाना नानी के सिवा और कोई रिश्ता होगा ही नहीं. एक छोटा आर्थिक रूप से मजबूत समाज शेष रहेगा.                    आपने विस्तार से अपने विचार रखे इस कारण मेरे कुछ विचार आपकी विस्तृत टिपण्णी में जगह नहीं पा सके हैं. मै इस मजबूरी को समझता हूँ. आपने अपना अमूल्य समय दिया इसके लिए मै पुनः आपका आभारी हूँ. धन्यवाद. 

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय अशोकजी नमस्कार आपके इस ब्लॉग में बहुत सुन्दर ढंग से विषय को प्रस्तुत किया है.सभी पाठकों की प्रतिक्रियाएं सराहनीय हैं.मैं उनमें से कुछ बिंदु पर ध्यान केन्द्रित कर रही हूँ १ सामाजिकता को सर्वाधिक रूप से एकलौती संतान समझ पाती है .वह अपने आस-पास,छात्रावास या अन्य जगहों पर ज्यादा मित्र बनाते हैं बस अभिभावक यह ध्यान रखे की इन मित्रों से उन्हें सुसंगति प्राप्त हो. २ आज इस आधुनिक भाग-दौड़ में सगे भाई-बहन भी रक्षा बंधन जैसे पर्व पर मिल नहीं पाते.कुछ जान बुझकर व्यस्त होते हैं कुछ को परिस्तितियाँ मजबूर बना देती हैं. ३ दो भाई या दो बहन या फिर एक भाई एक बहन होने पर भी माता-पिता को पास रखने के लिए उनमें लम्बी जिरह होते देखा है मैंने. ४ जब इकलौती संतान होगी तो वह अपने रिश्तेदारों यानी चाचा मौसा फूफा जैसे रिश्तों के बच्चों से घुलने मिलने को स्वयं मजबूर हो जायेगी और पारिवारिक रिश्ते स्वयं में सिमटे नहीं रहेंगे बस इस रिश्ते को समझाने की पहल माता को करनी होगी. ५ आजकल तो पुत्र हो या पुत्री दोनों ही घर से दूर पढ़ने चले जाते हैं माता-पिता अक्सर वृद्धावस्था में अकेले ही रह जाते हैं.ऐसे में समाज में एकल संतान के रूप में बढे युवा समझदारी से जिम्मेदारी लेते हुए वृद्ध दम्पति की मदद कर सकते हैं चाहे वे उनके किरायेदार हों,पड़ोसी या मित्र के माता-पिता.इससे अन्य रक्त संबंधों में भी प्यार स्नेह के फुल खिलेंगे जन संख्या तो कम होगी ही साथ ही सामाजिक माहौल प्रेम से भर उठेगा. ६ आर्थिक दृष्टिकोण से अपने एक बच्चे के आलावा अन्य ज़रूरतमंद की भी मदद की जा सकती है.फिर चाहे वे आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर रिश्तेदार के बच्चे हों या फिर समाज के ज़रूरतमंद बच्चे. आप के इस ब्लॉग के लिए बहुत आभारी हूँ.

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीय अशोक भाई जी, नमस्कार! आपने बातें बिलकुल सही रखी हैं. सामाजिक पारिवारिक और रीति रिवाज की माने तो 'हम दो हमारे दो' वाला नारा बिलकुल सही था. पर यह नारा प्रतिबद्धतता नहीं थी. अब चूंकि आर्थिक कारणों से ही लोग एकल संतान में संतुष्टि देखने लगे हैं. कहीं कहीं कुछ निजी कारण भी होते हैं. सब को मिलाकर देखा जाय तो हम दो हमारे दो वाला सिद्धांत सही लगता है चाहे लड़का हो या लडकी. आपने आपसी विचार बांटने की बात कही है, वहां यह भावना की पूर्ति होती दीखती है ...पर रक्षा बंधन और भैया दूज वाले त्यौहार से समझौता करना पड़ सकता है,..वैसी स्थिति में धर्मभाई और धर्म बहन बनाये जा सकते हैं, जो रिश्तेदारी में ममेरी, फुफेरी, चचेरी और मौसेरी आदि के रूप में मिल ही जाते हैं..... फिर भी आपका विषय विचारणीय है. आगे अन्य सुधीजन अपना विचार रखेंगे ही ... आपका आभार जो अपने इस सामाजिक समस्या की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया ... कुछ दिन पूर्व यमुना जी का आलेख 'सिर्फ एक ही बुलबुल काफी है' इसी तरफ ध्यान आकृष्ट कर रहा था.... आपने अपना विचार रक्खा .. आपका पुन: आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

रक्तलेजी, निश्चित तौर पर आपकी बात उचित ही जान पड़ती है।सामाजिक ताना-बाना बुनने में जब समानता की बात सोची गई तभी उस समानता को निश्चित करने के लिए लड़का-लड़की के समान होने की बात भी सोची गई होगी। जनसंख्या विस्फोट की वजह से आ रही समस्याओं के चलते अब एक संतान तक की बात कही गई है। वैसे इसमें कोई बाध्यता नहीं है क्योंकि जब महंगाई इतनी हो तब लोग ऐसा करके निश्चित तौर पर खुशहाली की कामना कर रहे हैं। हालांकि, आपकी चिंता वाजिब है जो कुछ समय बाद दिखेगी परंतु तब तक के लिए कुछ निरोधी उपायों की अपनाना सामाजिक दृष्टि से भी उचित है। ऐसे में तब तक इनकी जरूरत तो रहेगी है। फिर भी यह मानने में कतई संशय नहीं है कि जिन परिवारों में एकल संतान की अवधारणा को अपनाया है उन्हें कुछ परेशानी हो सकती है परंतु बात वहीं आ जाती है कि अगर वे पेट भर खा भी न पाते तब कैसा रहता। वैसे सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि कई परिवारों में समस्या इसीलिए है कि उनके यहां संतानों की संख्या इतनी अधिक है कि वहां पर प्रेम की बात ही नहीं बची है। ऐसे में इनको जरूर सोचना पड़ेगा। परिवार नियोजित हों परंतु विखंडित न हों, इसलिए पुरुष-स्त्री का सम भाग रहना जरूरी है ताकि हमारे सामाजिक तानेबाने को क्षति न पहुंचे।

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अजय जी              सादर, सर्व प्रथम आपसे सौ सौ बार क्षमा प्रार्थना हर उस बात के लिए जो आपको मेरी टिपण्णी में बुरी लगी हो. आपने अपना जो परिचय दिया है उससे मै पूर्व से अवगत हूँ. आपके ब्लॉग पर अक्सर मै टिपण्णी करता हूँ. इसलिए आपकी लेखनी से मै परिचित हूँ.यही कारण है कि मैंने आपको अच्छे विषय चुनने कि सलाह दी है.मंच पर कई वर्ग द्रष्टिगत होते हैं.मंच पर अश्लीलता पर पहले शायद आदरणीय भूपेंद्र जी पूरा एक आलेख लिख चुके हैं. क्या आप चाहते हैं कि आप अपना लेखन अवनति कि ओर ले जाएँ?             आपके बारे में जानते हुए हरियाणा के होने का लिखने का कारण को आप भलीभांति समझ सकते हैं. आप को अपना आलेख हटाना पड़ा इसका मुझे हार्दिक खेद हैं मगर फिरभी मै आपका इस बात के लिये आभारी हूँ.             हम नारी का सम्मान करते हैं और देवितुल्य मानकर सम्मान करते हैं. प्रतिदिन के व्यवहार में भी हम नारी के साथ उसके रिश्ते के अनुसार सम्बन्धों का निर्वाह करते हैं.यह किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं है.करोड़ों कि गिनती में हम चंद लोगो के गलत व्यवहार को उदाहरण नहीं बना सकते.अधिक ना लिखते हुए मै आशा करता हूँ कि आप मेरे मंतव्य को समझे और समाज के लिए कुछ अच्छा लिखें जैसा कि आपके पूर्व के आलेखों में मैंने पढ़ा है. आपका लेखन उत्तरोत्तर उन्नति के पथ पर जाए. यही मेरी शुभकामना है.                             

के द्वारा: akraktale akraktale

रक्ताले साहेब |आप से अनुरोध हैं कि ....मेरी अगर कोई रचना पसंद ना आये तो उस रचना पर टिप्पडी कीजिये ...किन्तु मैं हरियाणा से हूँ या लन्दन से ...........आपकी वो बात नही पसंद हैं मुझे | आपको यह हक नही हैं कि आप किसी स्थान विशेष को ......अपने स्थान विशेष से निम्न माने |मनोहर कहानियो वाली फिलोसफी ....आपको पसंद नही हैं ...आप एक सामाजिक मंच पर हैं ....किन्तु आपकी जक्सन कि बेबसाईट सबसे ज्यादा सेक्सुअल सस्ते जोक्स/लेखो या के लिए हिट कि जातीं हैं ....संभव हों तो उसका विरोध कीजिये |आप जानना चाहते हैं तो आप को मैं बता दूँ कि मैं बेसिकली इलाहाबाद से हूँ और प्रतिष्ठित एम्स में डॉ हूँ |आपका मैं सम्मान बहुत करता हूँ और मैं खुद उस तरह के लेख नही लिखता , इसलिये उस पोस्ट को वहाँ से हटा दिया हूँ |वहाँ उस लेख को रखना मेरी जरूरत थी ,उस समय कि क्यूंकि उस पर विस्तृत पटकथा वा फिल्मांकन होना हैं |

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

आदरणीय  ए के रक्ताले साहेब .. यह बड़ी बिडम्बना और ग्लानि का विषय है कि , हम भारतीय , महिलाओं के प्रति इतना सम्मान , आदर और श्रद्धा रखते हैं , साल में दो बार देवी के पर्व मनाते हैं पर इसका प्रभाव वह नहीं है जो हम पर्वों , चित्रों , मंदिरों , यज्ञों , जागरणों में ब्यक्त , प्रदर्शित करते हैं ....देवी जो नारी कि प्रतिदेवी हैं , उनके प्रति हमारा रोज-बरोज का रवैया , बहुत दुखद , खेदजनक और घृणास्पद है , जो कहता है - हम सभी तो नहीं पर अतिअधिक मनसा -वाचा-कर्मणा एक नहीं हैं ....इसपर हमे सोचना चाहिए और नारी के प्रति , समानता , श्रद्धा , सम्मान , ब्यवहार में लाना चाहिए , ( इसका अर्थ नर -नारी में परस्पर , स्नेह , प्रेम , संपर्क , सम्बन्ध , प्रेम , मित्रता का निषेध नहीं है , समानता -आदर की दरकार है ) ....आज समाज में जो नारी का शोषण हर स्तर पर दृश्यमान है , वह हमारी भारतीय संस्कृति , सभ्यता और सोच पर एक बदनुमा दाग है ......एक देवी की फोटो लगा कर , जागरण कर और पैदल पहाड़ों पर चढ़ कर देवी की पूजा अर्चना और व्रत -पूजा करके जय देवी कहने से , भला होने की प्रवृत्ति पर विचार करने की जरूरत है ......भक्त , देवता -देवी , मंदिर -संयासी सभी को पुनर- प्राण -प्रतिष्ठा की जरूरत है ......पत्थर की देवी की पूजा , दया , की मांग और जीवित देवी का नाना-प्रकार से शोषण , क्या यह हमारा दोहरा चरित्र नहीं है ?

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

जब मै पोल खोलने कि बात करता हूँ तो इसका सीधा सा मतलब है कि कांग्रेस में शामिल लगभग सभी दल अपने आर्थिक लाभ के कारण ही उसके साथ जुड़े हैं इसका धर्मनिरपेक्षता और कांग्रेस कि नीतियों जैसी बातों से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है. आज भी एक तरफ सब जनहित कि बात को लेकर सड़क पर खड़े हैं किन्तु जब बात आती है समर्थन वापसी कि तो सब गिरगिट कि तरह रंग बदलते नजर आते हैं. साफ़ बात है कि यूपीए एक अलोकतांत्रिक गठबंधन के जरिये देश में शासन कर रहा है.इससे एक बात और भी साफ़ होती है कि मायावती और शरद पवार को सीबीआई से कितना खतरा नजर आ रहा है कि एक विशाल जनहित के मुद्दे पर भी वे खामोश ही नजर आ रहे है या कि कांग्रेस के तलुए चाटते. आज तो सरकार के हर कदम पर सरकार की पोल खुलती नज़र आ रही है ! आपने ये लेख सितम्बर में लिखा है किन्तु ये आज भी उतना ही सटीक बैठता है जितना की पहले , देर से ब्लॉग पर आने के लिए क्षमा चाहूँगा रक्ताले जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: akraktale akraktale

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आदरणीय दीक्षित साहब                  सादर नमस्कार, एक आप और मै नहीं सारा देश ही आर्थिक स्थिति से जूझने लगा है. प्रधानमन्त्री जी का बेबाकी से यह कह देना कि गरीब व्यक्ति वर्ष भर में छः से अधिक सिलेंडर नहीं उपयोग करता. वे इसके आंकड़े भी बता पाते तो अच्छा होता किन्तु असत्य के आंकड़े लाये कहाँ से! मैंने कहीं इस बात को नहीं कहा है कि कांग्रेस के दौर में महंगाई बढ़ी है तो दूसरे दल कि सरकार बनेगी तो महंगाई कम हो जायेगी. जिस बात पर आप सहमत है कि नीतियां सुधारना चाहिए जिससे कि गरीब और माध्यम वर्ग पर बोझ कम हो.किन्तु इस सरकार ने ऐसे कोई कदम नहीं उठाये हैं कांग्रेस को सत्ता से इसलिए भी हट जाना चाहिए कि लगातार इनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं फिर निष्पक्ष फैसले कैसे होंगे? आम आदमी कि चिंता जाहिर करने के लिए आपका आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

अशोक जी, सादर नमस्कार. महंगाई या पेट्रोल,डीजल ,गैस हो अथवा अन्य कोई ,वस्तु , क्या जनता सरकार ,भाजपा सरकार में नहीं बढ़ी थी?इसके लिए केवल कांग्रेस ही दोषी क्यों,उनके सहयोगी क्यों नहीं ? सरकार की यही गलती है कि धीरे -धीरे ,बढ़ाना चाहिए था.सबसे बड़े दुःख की बात है कि ,मनमाना दाम वसूलने वाले ,उद्योग-पति,व्यापारी ,जो अधिकतर भाजपा से सम्बद्ध हैं,भी इसमें शामिल हैं.अटल जी जैसे विद्वान् नेता ने,सौ दिन में महंगाई समाप्त करने का वादा किया था,क्या हश्र हुआ,किसी से छुपा नहीं है.मैं कांग्रेसी नहीं हूँ,लेकिन इस विषय पर ,निष्पक्ष विवेचन करने और महंगाई कम करने हेतु ठोस उपाय सुझाने की भी आवश्यकता है.,क्योंकि मैं भी त्रस्त हूँ.

के द्वारा: omdikshit omdikshit

नमस्कार सर जी , इन्हें तो सबक सीखाना ही पड़ेगा........... सबसे बड़ी समस्या यह है की हमारा पढ़ा -लिखा जो तबका है,वो वोटिंग से दूर रहता है, और जो गरीब या अनपढ़ है वो अधिक से अधिक संख्या में वोटिंग करते है , क्यों की ये वोटिंग के लिए लाइन में खड़े हो सकते है , अपना समय अमूल्य वोटिंग के लिए दे सकते है | किन्तु हमारा, जिसे हम पढ़ा लिखा समाज कहते है , वो बहुत ही कम vote करता है | गरीब या अनपढ़ थोड़े से लाभ से अपना वोट किसी भरष्ट को वोट कर देता है , भविष्य में वो क्या करेगा ? इसका जरा भी विचार नही करता | ऐसे me 2014 तक गरीबो और किसानो को सरकार ने लाभान्वित किया तो........................................ देश के भविष्य पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, आप सोच सकते है | ऐसे में हमारे समाज सेवियों ,या जो देश के भविष्य को लेकर वास्तव में चिंतित है उन्हें कड़ी मेहनत करनी होगी है और लोगो को ये बताना होगा क़ि यह देश उनका अपना है और अपने देश को किसी ऐसे व्यक्ति या पार्टी को na सौपे जो देश के,और देशवाशियो के अहित में कम कर रहा हो

के द्वारा: mataprasad mataprasad

देश की संसद में, फूटे अंग्रेजी बोल // अपने ही देश में, फिर हिंदी हुई गुलाम / अंग्रेजी में हुए , सारे सरकारी काम // दोयम दर्जा इसे,अंग्रेजी समझे शान / पाठशाला में भी,इसे मिला नहि सम्मान // हिंदी भाषी सदा, है कहलाता नादान / जब तक ना हो उसे,धुर अंग्रेजी का ज्ञान // बिन अंग्रेजी नहीं,मिले कोई रोजगार / अंग्रेजों के यहाँ,हिंदी बन गइ बेगार // रक्तले जी, गुलामी की मानसिकता हमें शायद अपना कुछ करने के लिए सोचने को विवश नहीं करती। यही वजह है कि हम अंग्रेजी को ढो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेजी बिना सब सून.... हिंदी हुई विष और अंग्रेजी अमृत... आपने कविता में इस दर्द को बखूबी उभारा है परंतु देश के गुलाम प्रवृत्ति के सियासतदानों पर शायद इससे फर्क पड़ने वाला नहीं है। स्वयं आपने ही लिख दिया है कि हिंदी दिवस पर क्या तोहफा हिंदवासियों को दिया गया है?.... सादर आभार...

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

के द्वारा: akraktale akraktale